अमरोहा की पुरानी बस्तियों में सात मोहर्रम की सुबह आम दिनों जैसी नहीं थी। कटरा गुलाम अली स्थित अज़ाखाने के बाहर लोग जमा होने लगे थे।
कुछ ही देर में मातमी धुनों और मरसियों के बीच सात मोहर्रम का पारंपरिक जुलूस बरामद हुआ और शहर की गलियां कर्बला की यादों से भर उठीं।
इस जुलूस की सबसे अलग पहचान उसकी अराइश रही। तख्तों पर लगी ऊंची छतरियां दूर से ही नजर आ रही थीं।
लेकिन लोगों का ध्यान जिस चीज़ ने सबसे ज्यादा खींचा, वह था चांदी का झूला। करीब 16 किलो चांदी से बने इस झूले को हज़रत अली असगर की याद में निकाला गया था।
कर्बला की त्रासदी में शहीद हुए छह माह के अली असगर की याद आज भी अकीदतमंदों की आंखें नम कर देती है।
जुलूस शुरू होने से पहले मरसिया-ख्वानी हुई। मास्टर तबारक अली और उनके साथियों ने कर्बला के दर्द को अल्फाजों में ढाला। सुनने वालों के बीच खामोशी थी और चेहरों पर गम की परछाइयां साफ दिखाई दे रही थीं।
जुलूस में सबसे आगे ऊंट पर बैठे बच्चे थे। उनके पीछे शबीहे ताबूत, अलम और दुलदुल चल रहे थे।
दुलदुल को चादरों, तलवार और तबर से सजाया गया था। रास्ते भर लोग अपनी मन्नतों की चादरें चढ़ाते रहे। कई स्थानों पर जुलूस का गुलाब के फूलों से स्वागत किया गया।
यह दृश्य केवल धार्मिक आस्था का नहीं था। जुलूस के रास्ते में विभिन्न समुदायों के लोग भी स्वागत के लिए खड़े दिखाई दिए।
कहीं पानी का इंतजाम था तो कहीं फूल पेश किए जा रहे थे। इससे शहर की साझा संस्कृति और सामाजिक सौहार्द की झलक भी देखने को मिली।
शाम को जब जुलूस अपने शुरुआती मुकाम, अज़ाखाना कटरा गुलाम अली, वापस पहुंचा तो समापन ऐतिहासिक मरसिया "तन्हा सिपाहे शाम में जब घिर गया हुसैन" के साथ हुआ।
मरसिये के अल्फाज गूंज रहे थे और अमरोहा की गलियां मानो एक बार फिर कर्बला की सदियों पुरानी दास्तान सुन रही थीं।
रिपोर्ट मौ। अज़ीम अमरोहा
