रिपोर्टर -मदनलाल बर्मन
उमरिया -- वन विभाग की महती जिम्मेदारी वनों के संरक्षण की होती है, लेकिन वही अमला तस्करी के मायाजाल में फंसकर सागौन और खैर प्रजाति की लकड़ी के खेल में शामिल हो जाए तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं हो सकता। फिर वन संपदा, वन्य प्राणियों, पर्यावरण और मानव जीवन सब पर गहरा संकट आ जाता है। ऐसा ही एक संवेदनहीन मामला उमरिया जिले के घुनघुटी वन परिक्षेत्र में प्रकाश में आया है, जहां लाखों रुपए की लकड़ी रातों रात निचले अधिकारियों की मिलीभगत से पार हो गई और आला अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
12 अगस्त की दरम्यानी रात घुनघुटी से गांधी ग्राम मार्ग पर वन विभाग की फेंसिंग तोड़कर पीकप गाड़ियों से सागौन और खैर के विशालकाय वृक्षों को काटकर सिल्लिया बना लिया गया। गौर करने वाली बात है कि जब इतने बड़े पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलती है तो उसकी गूंज दूर तक जाती है, लेकिन चंद रुपयों के लालच में वन माफियाओं ने और विभाग के कुछ निचले अमले ने इसे अनसुना कर दिया। बताया जा रहा है कि इस लकड़ी का संग्रहण और कटाई कई दिनों से चल रही थी। इसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई और एक ही रात में लाखों की इमारती लकड़ी पार हो गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसी मार्ग पर वन विभाग का बेरियर लगा है जहां दिन-रात स्टाफ तैनात रहता है, इसके बावजूद लकड़ी से लदी गाड़ियां धड़ल्ले से निकल गईं।
सूत्र बताते हैं कि चोरी हुई लकड़ी पहले से ही काटकर जंगल में छिपाकर रखी गई थी और इसकी सूचना निचले स्तर के कर्मचारियों तक थी। लेकिन विभाग सोता रहा। नतीजा यह हुआ कि रात के अंधेरे में हाईवी ट्रक और पीकप वाहन जंगल के अंदर तक पहुंचे, लकड़ी लादी और बेरियर पार कर ले गए। सुबह जब ग्रामीणों ने जंगल में कटे ठूंठ और लकड़ी की चिलफिया देखा तब कहीं जाकर विभाग को "गुप्त सूचना" मिली।
इस पूरे मामले में निचले स्तर के अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत के पुख्ता संकेत मिलते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बेरियर होने के बाद भी भारी वाहन कैसे निकले? क्या चेकिंग के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई या जानबूझकर आंख बंद कर ली गई। दूसरा सवाल यह कि जिस रात यह वारदात हुई उस रात बेरियर और आसपास ड्यूटी पर रहे वनकर्मियों के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल क्यों नहीं खंगाली जाती। किससे बात हुई, कितनी देर बात हुई और लोकेशन क्या थी, इससे सारा सच सामने आ जाएगा। तीसरा और सबसे अहम सवाल यह कि जिस जगह से लकड़ी उठी वहां तक पीकप वाहन और बुलेट मोटरसाइकिल के निशान मिले हैं। जंगल के अंदर कच्चे रास्ते से ये वाहन सीधे कटाई वाली जगह तक गए। बिना लोकल गाइड के यह संभव नहीं। इसलिए घुनघुटी क्षेत्र में चलने वाले पीकप वाहन मालिकों की डिटेल और उस बुलेट के मालिक की पहचान कर पूछताछ जरूरी है।
मामला उजागर होने के बाद वन मंडलाधिकारी उमरिया ने जांच के आदेश दिए हैं। जांच के लिए रेंजर डिपो उमरिया धीरेंद्र सिंह और रेंजर अनुपम मिश्रा की टीम बनाई गई है। साथ में घुनघुटी रेंजर धर्मू सिंह और डिप्टी रेंजर जमुडी आलोक कुमार सिंह भी जांच में जुटे हैं। लेकिन स्थानीय लोग इसे "माल निकलने के बाद ठूंठ गिनना" कह रहे हैं। उनका आरोप है कि जब तक जांच पूरी होगी तब तक अगली खेप भी पार हो चुकी होगी।
यह पहली बार नहीं है। 2 महीने पहले भी इसी घुनघुटी से लाखों की खैर की लकड़ी चोरी हुई थी। तब भी पंचनामा बना, केस दर्ज हुआ, पर न कोई बड़ा आदमी पकड़ा गया न तस्करी रुकी। यानी "माल जाने दो, फिर कागज बना दो" वाला सिस्टम चल रहा है।
ग्रामीणों का दर्द भी यही है। उनका कहना है कि गरीब आदिवासी अगर सूखी लकड़ी उठा ले तो उस पर केस बन जाता है और यहां ट्रैक्टर-ट्राली भरकर सागौन-खैर निकल रहा है। बिना अंदर के लोगों की मदद के यह संभव नहीं। माफियाओं के हौसले इसलिए बुलंद हैं क्योंकि उन्हें पता है ऊपर से नीचे तक सेटिंग है।
वन विभाग का काम जंगल बचाना है न कि लुटने के बाद फोटो खींचना। घुनघुटी में जो हो रहा है वह सिर्फ तस्करी नहीं, सरकारी संपदा की खुली लूट है। वन विभाग के आला अधिकारियों से मांग है कि सिर्फ जांच टीम भेजने से काम नहीं चलेगा। दोषी अधिकारियों को चिन्हित कर सस्पेंड किया जाए, उनके फोन और वाहन मालिकों की डिटेल खंगाली जाए और तस्करी में शामिल लोगों की संपत्ति कुर्क की जाए। वरना वह दिन दूर नहीं जब घुनघुटी के जंगल गंजे हो जाएंगे और वन विभाग सिर्फ फाइलों में "वृक्षारोपण" करता रह जाएगा।

