जीरापुर के इंदर चौराहे पर गूंजी इंसाफ की घंटी,
तहसील से कलेक्ट्रेट तक गुहार बेअसर होने के बाद अब मुख्यमंत्री से उम्मीद:
जीरापुर सोमवार दोपहर ठीक 12 बजे जब तपती दोपहरी जलती सड़क पर जीरापुर के व्यस्ततम इंदर चौराहे पर गाड़ियों के शोर से गूंज रहा था, तभी एक ऐसी आवाज आई जिसने वहां मौजूद हर शख्स के कदमों को ठिठकने पर मजबूर कर दिया । यह आवाज किसी वीआईपी के काफिले की नहीं,बल्कि न्याय की गुहार लगाती एक घंटी की थी । हाथ में पीतल की घंटी, नंगे पैर, पसीने से तरबतर बदन और आंखों में न्याय की आस लिए दो किसान भाई जीरापुर से भोपाल की ओर बढ़े जा रहे थे । उनकी मंजिल कोई राजनीतिक रैली नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री का दरबार है ।
"न्याय की कानूनी लड़ाई जीती, पर दबंगई के आगे सिस्टम लाचार"
पैदल चल रहे इन बेबस किसानों की पहचान माचलपुर थाना क्षेत्र के खेड़ी पटेल गांव के निवासी देवी सिंह गुर्जर और उनके भाई के रूप में हुई है । देवी सिंह ने रुंधे गले से अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि उनकी पुश्तैनी जमीन पर पोलखेड़ा गांव के कुछ रसूखदार और दबंग लोग अवैध रूप से कब्जा करना चाहते हैं । पीड़ित किसान ने बताया"हम न्याय के लिए अदालत गए सालों केस लड़ा । कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला सुनाया,सारे कानूनी कागजात हमारे नाम पर हैं,अदालत से हम जीत गए,लेकिन जमीन पर कब्जा दिलाने में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा" ।
"तहसील से कलेक्ट्रेट तक सिर्फ आश्वासन,कार्रवाई शून्य"
किसानों का आरोप है कि कोर्ट का आदेश हाथ में होने के बावजूद उन्हें न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं, वे अपनी फरियाद लेकर हल्के के तहसीलदार से लेकर पुलिस थाने, एसडीएम और अंत में जिला कलेक्टर तक पहुंचे । लेकिन हर जगह से उन्हें सिर्फ फाइलों का आश्वासन मिला,जमीन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई अधिकारियों की इसी बेरुखी और निष्क्रियता से तंग आकर दोनों भाइयों ने यह कठोर कदम उठाया है ।
"180 किलोमीटर का सफर और 'इंसाफ की घंटी"
अपनी आजीविका के इकलौते साधन को बचाने के लिए इन किसानों के पास अब केवल मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) की आखिरी उम्मीद बची है । जीरापुर से भोपाल की दूरी करीब 180 किलोमीटर है,चिलचिलाती धूप में नंगे पैर चलते हुए देवी सिंह कहते हैं "इसी जमीन से हमारे पूरे परिवार और बच्चों का पेट पलता है । अगर यह भी छिन गई,तो हम कहां जाएंगे ? अब मुख्यमंत्री जी ही हमारी आखिरी उम्मीद हैं । "बड़ा सवाल: कोर्ट के आदेश की अहमियत क्या ? यह घटना सीधे तौर पर मध्य प्रदेश के प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है । जब देश की न्यायप्रणाली किसी पीड़ित के पक्ष में फैसला दे देती है,तो उसे लागू कराने के लिए एक आम किसान को सड़कों पर क्यों आना पड़ता है ? फिलहाल, हाथ में उम्मीद की घंटी लिए ये कदम भोपाल की तरफ बढ़ रहे हैं और अब पूरे इलाके की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इन अनाम किसानों की घंटी की गूंज वल्लभ भवन (सचिवालय) के बंद कमरों तक पहुंच पाएगी या नहीं ।
अमन खान इंकलाबी*
