रात गहराती रही, लेकिन अमरोहा की गलियां जागती रहीं। काले लिबास में लिपटे हजारों चेहरे, नम आंखें और लबों पर सिर्फ एक नाम "या हुसैन" 9 मुहर्रम का पारंपरिक निशानों का जुलूस इस बार केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि ऐसा भावनात्मक समंदर था जिसमें पूरा शहर डूबा दिखाई दिया।
दरबार कलां से निकले जुलूस से पहले जब मजलिस में कर्बला के दर्द का जिक्र हुआ तो कई आंखें छलक उठीं। इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानी का बयान सुनकर ऐसा लगा मानो 1400 साल पुराना इतिहास अमरोहा की गलियों में फिर से जीवित हो उठा हो।
जुलूस आगे बढ़ता रहा और रास्तों पर लोगों का सैलाब उमड़ता रहा। कोई पानी बांट रहा था, कोई शरबत पिला रहा था, तो कोई चुपचाप खड़ा होकर गुजरते निशानों को निहार रहा था। शहर की रौनक इस रात किसी मेले की नहीं, बल्कि साझा दर्द और मोहब्बत की तस्वीर पेश कर रही थी।
लेकिन असली मंजर तब बना जब जुलूस कटकुई स्थित दोस्त अली हाउस पहुंचा। मशहूर नौहाख्वान समर मुज्तबा अमरोहवी ने जैसे ही दर्द भरी आवाज में पढ़ा—"भूल जाएंगे सब कुछ, कर्बला न भूलेंगे..."—तो पूरा माहौल सिसकियों से भर गया। हजारों अज़ादारों के हाथ सीने पर उठे और मातम की सदाओं के बीच ऐसा लगा जैसे हर दिल अपने-अपने गम भूलकर कर्बला के दर्द से जुड़ गया हो।
रात के अंधेरे में जगमगाते इमामबारों की रोशनी और उनमें उमड़ती भीड़ एक अलग ही तस्वीर पेश कर रही थी। अमरोहा ही नहीं, आसपास के गांवों से आए लोग इस नजारे को देखने और महसूस करने पहुंचे। यहां किसी की पहचान जाति, वर्ग या पेशे से नहीं थी; सबके बीच सिर्फ इंसानियत, वफादारी और कुर्बानी का पैगाम था।
मुहर्रम की यह रात अमरोहा को फिर याद दिला गई कि वक्त बदल जाता है, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन कर्बला का दर्द और हुसैन की याद सदियों बाद भी दिलों को उसी तरह भिगो देती है, जैसे पहली बार भिगोया था।
रिपोर्ट मौ। अज़ीम अमरोहा
