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नगर परिषद की अनदेखी: सार्वजनिक पेशाबघर बने बीमारियों के केंद्र, बदबू से राहगीरों का जीना मुहाल...............NN81


*सार्वजनिक सुविधाओं के बेकार होने का सबसे बुरा असर महिलाओं और बुजुर्गों पर* 

 


 झांसी रोड स्थित रेस्ट हाउस के पास नगर परिषद के सार्वजनिक पेशाबघरों और शौचालयों की बदहाल स्थिति ने नगर वासियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। नियमित सफाई के अभाव और बुनियादी ढांचे के चरमराने के कारण ये जनसुविधा केंद्र अब राहत देने के बजाय बीमारियों को दावत दे रहे हैं। 


सफाई व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त


स्थानीय दुकानदारों और राहगीरों का कहना है कि नगर परिषद द्वारा नियुक्त सफाई कर्मचारी इन स्थानों पर महीनों से नहीं पहुंचे हैं। मूत्रालयों में जमी गंदगी और भीषण दुर्गंध के कारण आसपास के दुकानदारों का अपनी दुकानों पर बैठना भी मुश्किल हो गया है। गंदगी के कारण मच्छरों और मक्खियों का प्रकोप बढ़ गया है, जिससे संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा मंडरा रहा है।

टूटे ढांचों ने बढ़ाई मुसीबत

केवल सफाई ही नहीं, बल्कि इन शौचालयों की भौतिक स्थिति भी अत्यंत दयनीय है। अधिकतर पेशाबघरों के दरवाजे गायब हैं, पाइपलाइनें टूट चुकी हैं और पानी की व्यवस्था नदारद है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में इनका उपयोग करना किसी जोखिम से कम नहीं है।


मजबूरी में खुले में शौच को मजबूर लोग

सार्वजनिक सुविधाओं के बेकार होने का सबसे बुरा असर महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ रहा है। उचित वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण राहगीरों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, और कई लोग मजबूरी में खुले में शौच करने के लिए विवश हैं। यह स्थिति स्वच्छता अभियान के दावों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है।


कार्रवाई की मांग

स्थानीय निवासियों ने नगर परिषद प्रशासन को कई बार मौखिक शिकायतें की हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। नाराज दुकानदारों और नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इन पेशाबघरों की मरम्मत और नियमित सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई, तो उन्हें आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ेगा।


क्या नगर परिषद प्रशासन जनता की इस बुनियादी समस्या का संज्ञान लेकर समय रहते कोई उचित समाधान निकालेगा? यह एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।


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स्वच्छता अभियान के दावों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करते है नगर के पेशाब घर 


मजबूरी में खुले में शौच को मजबूर लोग सार्वजनिक सुविधाओं के बेकार होने का सबसे बुरा असर महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ रहा है। मूत्रालयों की जर्जर हालत और गोपनीयता के अभाव के कारण महिलाएं खुले में पेशाब करने को मजबूर हैं, जो उनकी सुरक्षा और गरिमा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। वहीं, राहगीरों को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, और कई लोग गंदगी व दुर्गंध के कारण मजबूरी में खुले में शौच करने के लिए विवश हैं। यह स्थिति स्वच्छता अभियान के दावों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है।

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