पाकुड़: एक ओर सरकार मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई व्यवस्था मजबूत करने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।
महेशपुर प्रखंड के चक्कुधरा ग्राम पंचायत में हयातुन बीबी की जमीन पर मनरेगा योजना के तहत स्वीकृत सिंचाई कुआँ लंबे समय से अधूरा पड़ा है। निर्माण कार्य बीच में ही रुक जाने से ग्रामीणों और किसानों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि समय पर कुआँ पूरा हो जाता तो खेती के लिए पानी की बड़ी समस्या दूर हो सकती थी, लेकिन अब यह अधूरा निर्माण सरकारी उदासीनता की मिसाल बनकर रह गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि लाखों रुपये की योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल पाया। अधूरा कुआँ न केवल किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर रहा है, बल्कि आसपास के लोगों के लिए दुर्घटना का कारण भी बन सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब योजना स्वीकृत हुई और निर्माण शुरू हुआ, तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि काम बीच में ही रोक दिया गया? क्या फंड की कमी है, ठेकेदार की लापरवाही या फिर विभागीय उदासीनता?
अब सवाल उठता है कि यह कुआँ कब से अधूरा पड़ा है?
क्या निर्माण कार्य को बीच में ही रोक दिया गया ? आखिर इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? अगर इस अधूरे कुएँ में कोई हादसा होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या प्रशासन ने अब तक इस मामले की जांच की है?
किसानों को योजना का लाभ आखिर कब मिलेगा?
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि अधूरे पड़े सिंचाई कुएँ का निर्माण जल्द से जल्द पूरा कराया जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है, या फिर यह अधूरा कुआँ सरकारी योजनाओं की बदहाल स्थिति का एक और प्रतीक बनकर यूँ ही खड़ा रहेगा।
संवाददाता :- रंजित कुमार साह
