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सिंध नदी में ‘मौत का साम्राज्य’! पनडुब्बियों से खोदी जा रहीं 200 फीट गहरी कब्रें, रेत माफिया के आगे नतमस्तक सिस्टम?...........NN81


 



भिंड में नदी का सीना छलनी, पुलों पर मंडरा रहा खतरा, शिकायतों के बाद भी कार्रवाई गायब

भिंड। सिंध नदी आज कराह रही है। इंदुर्खी और मेहदा के आसपास कथित तौर पर जिस तरह पनडुब्बियों और भारी मशीनों से रेत निकाली जा रही है, उसने पूरे जिले में बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या भिंड में कानून का राज है या रेत माफिया का?


ग्रामीणों का आरोप है कि नदी के भीतर 100 से 200 फीट तक गहरे गड्ढे खोदे जा रहे हैं। ये गड्ढे सिर्फ खनन नहीं, बल्कि इंसानों के लिए मौत के कुएं बनते जा रहे हैं। कई बार हादसों की आशंका जताई गई, शिकायतें हुईं, वीडियो वायरल हुए, खबरें छपीं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खामोशी दिखाई दी।


रेत नहीं, सिंध नदी का अस्तित्व निकाला जा रहा है!


स्थानीय लोगों का कहना है कि अब नदी से रेत नहीं निकाली जा रही, बल्कि पूरी नदी को खत्म करने की तैयारी चल रही है। जहां नजर डालो वहां गहरे गड्ढे, मशीनों का शोर और रेत के पहाड़ दिखाई देते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसके दम पर नदी के बीचों-बीच पनडुब्बियां उतर रही हैं?


 किसके संरक्षण में भारी मशीनें दिन-रात नदी का सीना चीर रही हैं?


क्या खनन विभाग रक्षक है या दर्शक?


जब गांव का आम आदमी देख सकता है कि नदी में क्या हो रहा है, तो क्या जिम्मेदार विभागों को दिखाई नहीं देता?


यदि सब कुछ नियमों के तहत हो रहा है तो जनता को पूरी जानकारी क्यों नहीं दी जा रही? और यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?


ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायतों की फाइलें बनती हैं, जांच के आश्वासन दिए जाते हैं,


 लेकिन जमीन पर हालात जस के तस बने हुए हैं।


करोड़ों के पुलों के नीचे खोदी जा रही तबाही


इंदुर्खी और मेहदा पुल के आसपास कथित खनन को लेकर लोग बेहद चिंतित हैं। करोड़ों रुपये की लागत से बने और निर्माणाधीन पुलों के आसपास यदि लगातार गहराई तक उत्खनन होता रहा तो भविष्य में इसकी कीमत जनता को चुकानी पड़ सकती है।


यदि कल को पुल में दरार आती है, नींव कमजोर होती है या कोई बड़ा हादसा होता है तो जिम्मेदार कौन होगा?

रेत कंपनी?


खनन विभाग?

या वे अधिकारी जो शिकायतों के बावजूद आंखें मूंदे बैठे हैं?


रास्ते बंद कर फोटो खिंचवाने से नहीं रुकेगा अवैध कारोबार


प्रशासन कभी रास्ते बंद करता है, कभी खाइयां खुदवाता है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि असली खेल तो नदी के भीतर चल रहा है।

लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब तक पनडुब्बियां, मशीनें और कथित अवैध उत्खनन नहीं रुकेगा, तब तक दिखावटी कार्रवाई का क्या मतलब?

जल-जंगल-जमीन बचाओ या रेत माफिया बचाओ?

मंचों पर पर्यावरण बचाने के भाषण दिए जाते हैं। नदियों को जीवन रेखा बताया जाता है। जल संरक्षण के संकल्प लिए जाते हैं।


लेकिन सिंध नदी की तस्वीर कुछ और कहानी कह रही है।

जनता पूछ रही है—

क्या पर्यावरण संरक्षण सिर्फ भाषणों के लिए है?


क्या सिंध नदी की पुकार शासन तक नहीं पहुंच रही?

क्या रेत माफिया सरकार से भी ज्यादा ताकतवर हो गए हैं?


जनता के सवाल, जिनका जवाब जरूरी है


क्या पनडुब्बियों से खनन की अनुमति है?


 क्या स्वीकृत क्षेत्र छोड़कर दूसरी जगहों से रेत निकाली जा रही है?


 क्या पुलों के आसपास खनन नियमों के अनुसार हो रहा है?


 शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?


 आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह पूरा खेल?

अरविंद सिंह जादौन

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