रौन ब्लॉक के किसानों का फूटा गुस्सा
मंत्री ने माना था 100% नुकसान, तीन महीने बाद भी राहत शून्य खेतों की तस्वीरें खोल रहीं सिस्टम की पोल
भिंड/रौन। अप्रैल माह में आई भीषण ओलावृष्टि, तेज बारिश और तूफान ने रौन ब्लॉक के किसानों की खड़ी फसलों को चंद मिनटों में तबाह कर दिया था। उस समय प्रभावित क्षेत्रों के दौरे पर पहुंचे प्रदेश के कैबिनेट मंत्री राकेश शुक्ला ने स्वयं मीडिया के सामने स्वीकार किया था कि कई गांवों में किसानों की फसलों का 100 प्रतिशत तक नुकसान हुआ है। उन्होंने आश्वासन दिया था कि जल्द सर्वे कराकर किसानों को मुआवजा दिलाया जाएगा।
लेकिन सवाल यह है कि जब नुकसान 100 प्रतिशत था, तो मुआवजा 0 प्रतिशत क्यों है।
आज घटना के करीब तीन महीने बाद जब रौन बौहारा, मढ़ी, जैतपुरा, चिचाई विरखड़ी और आसपास के कई गांवों के खेतों का जायजा लिया गया तो दृश्य देखकर हर कोई स्तब्ध रह गया। खेतों में आज भी बड़ी मात्रा में अनाज बिखरा पड़ा दिखाई दे रहा है। ऐसा लग रहा था मानो किसी ने खेतों में अनाज की चादर बिछा दी हो। यह दृश्य उस प्राकृतिक आपदा का जीवंत प्रमाण है जिसने किसानों की सालभर की मेहनत को मिट्टी में मिला दिया।
खेत चीख-चीखकर कह रहे हैं नुकसान हुआ था, लेकिन फाइलें खामोश हैं!
किसानों का आरोप है कि सर्वे केवल औपचारिकता बनकर रह गया। वास्तविक नुकसान को उतना दर्ज नहीं किया गया जितना हुआ था। यदि खेतों में आज भी बिखरा पड़ा अनाज दिखाई दे रहा है तो आखिर सर्वे के दौरान अधिकारियों को यह तबाही क्यों नहीं दिखाई दी।
ग्रामीणों का कहना है कि कागजों में नुकसान कम दिखाकर मामले को दबाने की कोशिश की गई, जबकि जमीनी सच्चाई आज भी खेतों में मौजूद है।
खाद-बीज के पैसे तक नहीं निकले, अब परिवार कैसे पालें।
प्रभावित किसानों ने बताया कि फसल पूरी तरह चौपट हो गई। कई किसानों की लागत तक वापस नहीं निकली। खाद, बीज, जुताई, सिंचाई और मजदूरी पर खर्च किए गए लाखों रुपये डूब गए।
किसानों का दर्द साफ झलकता है
फसल चली गई, आमदनी खत्म हो गई, मुआवजा नहीं मिला। अब अगले सीजन की बुवाई के लिए पैसे कहां से लाएं।
परिवार का पेट कैसे भरें।
अन्नदाता सिर्फ भाषणों तक सीमित।
एक तरफ सरकार किसानों को अन्नदाता कहकर सम्मानित करती है, दूसरी तरफ आपदा की मार झेल रहे किसान राहत के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
किसानों का कहना है कि देश का पेट भरने वाला किसान आज खुद संकट में है। जो किसान पूरे देश को अनाज, दाल, सब्जियां और खाद्यान्न देता है, वही किसान आज अपने घर का चूल्हा जलाने की चिंता में डूबा हुआ है।
ग्रामीणों का सवाल है—
क्या अन्नदाता सिर्फ मंचों और भाषणों तक सीमित हैं?"
तस्वीरें पूछ रहीं सवाल
अगर नुकसान नहीं हुआ था तो खेतों में आज भी इतना अनाज क्यों बिखरा पड़ा है?
अगर सर्वे निष्पक्ष था तो किसानों को राहत राशि क्यों नहीं मिली?
अगर मंत्री का बयान सही था तो कार्रवाई कहां अटक गई?
अगर सरकार किसानों की हितैषी है तो तीन महीने बाद भी किसान राहत के इंतजार में क्यों हैं?
किसानों का फूटा दर्द
किसानों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार ऐसा महसूस किया है कि प्राकृतिक आपदा के बाद भी उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं लिया गया।
उनका कहना है कि—
"हमारे घरों में अनाज नहीं है। हालात ऐसे हैं कि चूहे भी भूखे लौट रहे हैं। जब घर में चूहों तक को खाने के लिए दाना नहीं मिल रहा, तब परिवार का सालभर गुजारा कैसे होगा?"
किसानों का आरोप है कि मंचों से बड़े-बड़े भाषण देने से कोई किसान हितैषी नहीं बन जाता। किसान हितैषी वही है जो संकट की घड़ी में किसानों के साथ खड़ा दिखाई दे।
सबसे बड़ा सवाल
क्या खेतों में बिखरा पड़ा अनाज भी सरकार और प्रशासन को नुकसान का सबूत नहीं लगता?
क्या 100 प्रतिशत नुकसान स्वीकार करने के बाद भी किसानों को उनका हक नहीं मिलेगा?
क्या अन्नदाता की पीड़ा सिर्फ घोषणाओं और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगी?
अरविंद सिंह जादौन
