*क्या सच बोलना गुनाह है*
शिकायत वापस न लेने पर सरकारी योजनाओं से वंचित करने की धमकी का आरोप, 6 महीने से न्याय के लिए भटक रहे ग्रामीण
भिंड/रौन। रौन जनपद पंचायत अंतर्गत बौहारा ग्राम पंचायत में कथित भ्रष्टाचार का मामला अब विस्फोटक रूप लेता जा रहा है। पंचायत में बिना कार्य कराए लाखों रुपए के फर्जी बिल लगाकर भुगतान निकालने, फर्जी मजदूरों के नाम पर राशि आहरित करने और शिकायतों को दबाने के लिए कथित धमकी देने जैसे गंभीर आरोपों ने पूरे प्रशासनिक अमले पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत में ऐसे लोगों के नाम मजदूरों की सूची में दर्ज कर लाखों रुपए निकाल लिए गए, जिन्होंने आज तक पंचायत में कोई काम नहीं किया। कई ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें यह तक जानकारी नहीं थी कि उनके नाम पर मजदूरी भुगतान दिखाया गया है।
सचिव अटैच, फिर भी पास होते रहे लाखों के बिल!
लगातार शिकायतों के बाद पंचायत सचिव को जनपद पंचायत में अटैच किया गया था, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि अटैचमेंट के बावजूद पंचायत से लाखों रुपए के बिल पास किए गए। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किसके संरक्षण में यह पूरा खेल चलता रहा?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सचिव को पंचायत कार्यों से अलग किया गया था, तो फिर भुगतान प्रक्रिया कैसे जारी रही? क्या संबंधित अधिकारियों की मौन सहमति से पूरा मामला संचालित होता रहा?
6 महीने से न्याय के लिए भटक रहे ग्रामीण
ग्रामीणों के अनुसार वे पिछले छह महीनों से जनपद पंचायत, जिला पंचायत और जनसुनवाई तक शिकायतें करते आ रहे हैं, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है, जबकि भ्रष्टाचार के आरोप लगातार गंभीर होते जा रहे हैं।
181 शिकायत में
फर्जी निराकरण का गंभीर आरोप
मामले में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला आरोप मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 को लेकर सामने आया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि पंचायत के उपयंत्री और रोजगार सहायक द्वारा बिना मौके पर पहुंचे ही कथित रूप से झूठा सत्यापन कर शिकायत बंद करने की कोशिश की जा रही है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि न कोई अधिकारी गांव आया, न शिकायतकर्ताओं से बात की गई और न ही किसी प्रकार की जांच हुई, लेकिन ऊपर ही ऊपर फर्जी रिपोर्ट तैयार कर शिकायत के निराकरण का दावा किया जा रहा है।
शिकायत वापस लेने का दबाव और धमकी?
शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उपयंत्री और रोजगार सहायक द्वारा उन पर दबाव बनाया जा रहा है कि यदि 181 से शिकायत वापस नहीं ली गई तो परिवार आईडी, सरकारी योजनाएं और अन्य जरूरी दस्तावेजों में बाधा डालकर योजनाओं से वंचित कर दिया जाएगा।
ग्रामीणों का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को डराया-धमकाया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं ने आशंका जताई कि यदि फर्जी निराकरण भेजने में कर्मचारियों को डर नहीं लग रहा, तो भविष्य में उनके खिलाफ झूठे प्रकरण भी बनाए जा सकते हैं।
181 जनता की मदद के लिए बनी थी या शिकायत दबाने के लिए?
ग्रामीणों ने तीखे शब्दों में कहा कि सरकार ने 181 व्यवस्था जनता को न्याय दिलाने और समस्याओं का समाधान करने के लिए शुरू की थी, लेकिन बौहारा पंचायत में यह व्यवस्था मजाक बनती नजर आ रही है। आरोप है कि शिकायतों का वास्तविक निराकरण करने के बजाय फर्जी रिपोर्ट लगाकर मामले बंद किए जा रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि 181 जैसी शिकायत प्रणाली में भी फर्जी रिपोर्ट लगाई जा रही है, तो इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि पंचायत में फर्जी दस्तावेज, फर्जी मस्टर रोल और फर्जी बिलों के जरिए कितने बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ होगा।
ग्रामीणों ने उठाए बड़े सवाल
बिना काम कराए लाखों रुपए का भुगतान कैसे हुआ?
फर्जी मजदूरों के नाम पर राशि किसने निकाली?
अटैचमेंट के बाद भी सचिव द्वारा बिल कैसे पास किए गए?
181 शिकायतों का कथित फर्जी निराकरण किसके इशारे पर हुआ?
शिकायतकर्ताओं को धमकाने वालों पर कार्रवाई कब होगी?
क्या भ्रष्टाचार को दबाने की कोशिश हो रही है?
*हमें न्याय चाहिए*
ग्रामीणों ने वरिष्ठ अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही पंचायत के वित्तीय रिकॉर्ड, मस्टर रोल और भुगतान प्रक्रिया की जांच कर दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई तथा भ्रष्टाचार की राशि की वसूली की मांग उठाई है।
अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है, या फिर शिकायतें फाइलों में दबाकर ग्रामीणों को यूं ही न्याय के लिए भटकना पड़ेगा।
अरविंद सिंह जादौन
