खामगांव जिला बुलढ़ाणा महाराष्ट्र
खेती और किसानों की कहानियां और दुख-दर्द हम हर दिन सुनते हैं, लेकिन सातपुड़ा पहाड़ों की तलहटी में एक हिम्मतवाले किसान सुभाष चांदुरकर ने इससे उभरने की कोशिश की है। पारंपरिक खेती से हटकर उन्होंने यहां सेब के पौधे लगाए। डेढ़ साल के अंदर ही ढाई एकड़ के इस बगीचे में फूल खिल गए हैं और पेड़ों में फल भी लग गए हैं। चूंकि यह जिले काही नहीं बल्कि विदर्भ का पहला एक्सपेरिमेंट है, इसलिए दूर-दूर से किसान और रिसर्चर हेतु हर दिन उनके सेब के बगीचे को देखने यहां आ रहे हैं। इस इलाके में, बहुत ज़्यादा और कड़ी गर्मी के बावजूद, उन्होंने सभी मुश्किलों पर मात देते हुए सेब का बगीचा सजाकर एक मिसाल कायम की है। हालांकि यह फल सरकार की बाग सब्सिडी स्कीम में शामिल नहीं है, लेकिन उन्होंने दिसंबर 2024 में अपने खर्चे पर टुनकी खुर्द में गट नंबर 37 में ढाई एकड़ खेत में सेब लगाए। मिट्टी की जांच के बाद, उन्होंने हरमन 500, अन्ना और गोल्डन डोरोस आस तरह कुल 1,000 पौधे हिमाचल प्रदेश के पटियाला गांव की एक नर्सरी से बुलाकर लगाए थे। एक पौधा टुनकी खेत तक पहुंचने की लागत 350 रुपए लगी। पौधे लगाने से लेकर आज तक, उन्हें इस बगीचे को फलने-फूलने के लिए हर दिन हिमाचल प्रदेश के रिसर्चर हरमिनभाई शर्मा से मोबाइल के द्वारा बहुमुल्य मार्गदर्शन मिल रहा है किसान सुभाष चंदुरकर ने कहा कि रिसर्चर हरमिनभाई शर्मा जून में खुद टुनकी खेत में इस बगीचे को देखने आएंगे। फिलहाल हर पेड़ पर सिर्फ़ 4 से 5 फल ही बचे हैं। उन्होंने कहा कि गाय के गोबर का इस्तेमाल करके ड्रिप एरिगेशन के ज़रिए पानी और दूसरे केमिकल फर्टिलाइज़र देने का प्लान बनाया जा रहा है। क्योंकि सेब सरकार की बाग सब्सिडी सुची में शामिल नहीं है, इसलिए वे यह सारा खर्च खुद उठा रहे हैं। इस इलाके में कश्मीर बनाने की उनकी यह कोशिश तारीफ़ के काबिल है। 12 एकड़ के कलेक्टिव फार्म के मालिक सुभाष चंदुरकर, खुद और अपने परिवार के साथ मिलकर 2.5 एकड़ के सेब के बाग की कामयाबी से प्लानिंग कर रहे हैं। कॉमर्स में ग्रेजुएट सुभाष चंदुरकर संग्रामपुर परचेज़ एंड सेल कोऑपरेटिव सोसाइटी के पहले प्रेसिडेंट रह चुके हैं।
मोहम्मद फारूक खामगांव
