जिनेंद्र भगवान की वाणी का रसपान करें, कर्मों की निर्जरा होकर पुण्यार्जन होगा -- भूतबलि सागर महाराज
जब मां की वाणी में दम है तो मां जिनवाणी की वाणी में कितना दम होगा - मुनि सागर महाराज
रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी
आष्टा।काम में विध्न न आएं, इसलिए सामंजस्य से काम करना चाहिए।मिथ्यादृष्टि लोग विवाद करना चाहते हैं, लेकिन हमें विवाद नहीं करना है, ऐसा ही प्रयास करें।जिनेंद्र भगवान की वाणी का रसपान करें, कर्मों की निर्जरा होकर पुण्यार्जन होगा आपने सभी कर्मों को जीत लिया है ,इसलिए आप जिनेंद्र कहलाते हैं।तत्व क्या है, तत्वों का सार क्या है।एक वस्तु में अनेक गुण है। सुनेंगे सब की , लेकिन करेंगे धर्म की।
जब मां की वाणी में दम है तो मां जिनवाणी की वाणी में कितना दम होगा ।
उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर विराजित पूज्य गुरुदेव मुनि भूतबलि सागर महाराज एवं मुनि सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। मुनिश्री ने कहा कि इस कलयुग में मिथ्या से कल्याण नहीं। हनुमान जी एवं विभीषण ने सत्य ओर धर्म का साथ देते हुए श्री राम के साथ आए। जिनेंद्र भगवान की वाणी का रसपान करें। डॉक्टर, गुरु व बड़े जन से मृदु वचन बहुत अच्छे लगते हैं।जल शीतल है,चंदन शीतल है, फिर भी शांति नहीं। भगवान की वाणी शीतल कर देती है। भगवान की वाणी सुनने से हमारा कल्याण होगा, भगवान को सुनाने से कल्याण नहीं होगा। हमेशा भगवान की सुनें एवं बड़ों की सुनकर अपने जीवन में अनुशरण करें। जिनेंद्र की वाणी में कषाय नहीं है।बचपन से ही मधुर वाणी बोलते हैं। जिनेंद्र भगवान वीतरागी है,शीतल है, इसलिए उनकी वाणी को सुनें। समझदार के लिए इशारा काफी है। स्वध्याय से अंतरंग में शीतलता आ जाती है। मुनिश्री ने कहा कि रात्रि में भोजन और पूजन नहीं होती। शांतिनाथ भगवान एवं शीतलनाथ भगवान की सुनें, तभी कल्याण होगा। जब मां की वाणी में दम है तो जिनवाणी मां की वाणी में कितना अधिक दम है।
मां के समझाने पर रुठा हुआ बालक मान जाता है। असली शांति तो भगवान की वाणी और स्वाध्याय से ही मिलेंगी।पूजन और स्वाध्याय अलग -अलग कर रहे हैं, जबकि मिले सुर मेरा तुम्हारा की तर्ज पर साथ - साथ पूजन व स्वाध्याय करें।आज स्थिति यह है कि 70 साल बाद भी मन के विकार दूर नहीं हो रहें और मन साफ नहीं हो रहा है। पूजन कम करों, स्वाध्याय अधिक करें।आपस में मिलजुल कर रहना चाहिए। प्रेम से बोलो और प्रेम के साथ रहें।आपका व्यवहार अच्छा है। कठोरता में कोमलता होना चाहिए।हित मित वचन बोलने चाहिए। मुनि सागर महाराज ने कहा कि स्वाध्याय परम तप की श्रेणी में आता है।सम्यकज्ञानी मनमानी नहीं करते।जैनेतर की श्रद्धा देखी जाती है।पाप एवं अर्थ क्षेत्र में ड्रेस कोड लागू है, लेकिन धर्म क्षेत्र में नहीं। मंदिर के लिए भी कानून अर्थात ड्रेस कोड लागू होना चाहिए। भावना बदलना है तो एक रुपता लाए। धर्म क्षेत्र की अलग एवं एक जैसी ड्रेस होना चाहिए।


