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कबीरधाम के जंगलों पर लकड़ी माफियाओं का कब्जा, सागौन तस्करी बेखौफ जारी — परियोजना मंडल की कार्यशैली पर उठे बड़े सवाल : NN81

 

 

 कबीरधाम के जंगलों पर लकड़ी माफियाओं का कब्जा, सागौन तस्करी बेखौफ जारी — परियोजना मंडल की कार्यशैली पर उठे बड़े सवाल : 

कवर्धा। कबीरधाम जिले के वन क्षेत्रों में इमारती लकड़ी की अवैध कटाई लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग मानो आंख मूंदकर बैठा हुआ है। ताजा मामला छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम के अंतर्गत आने वाले परियोजना मंडल कबीरधाम के रेंज तरेगांव से सामने आया है, जहां कक्ष क्रमांक 411 में बहुमूल्य सागौन के पेड़ों की लगातार कटाई किए जाने की जानकारी सामने आने के बाद विभाग की कार्यशैली संदेह के घेरे में आ गई है। क्षेत्र से मिल रही जानकारी के अनुसार, मगरवाड़ा नदी के आगे स्थित जंगल में वर्षों पुराने विशाल सागौन वृक्षों को लकड़ी तस्कर लगातार निशाना बना रहे हैं।

ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि यह अवैध कटाई किसी एक रात की घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहा संगठित खेल है। तस्कर रात के अंधेरे का फायदा उठाकर जंगल में प्रवेश करते हैं। वे अपने साथ आरी और अन्य कटाई उपकरण लेकर आते हैं और जरूरत के अनुसार मौके पर ही सागौन के पेड़ों को काटकर लकड़ी को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट देते हैं, ताकि उसे आसानी से बाहर निकाला जा सके। यह तरीका साफ दर्शाता है कि तस्करों को इलाके की पूरी जानकारी है और वे बिना किसी डर के अपना काम अंजाम दे रहे हैं।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर जंगलों में अवैध कटाई हो रही है और विभाग को इसकी भनक तक नहीं लग रही? या फिर विभाग सब कुछ जानते हुए भी कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकता निभा रहा है? स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी ऐसा मामला सामने आता है, विभाग केवल पीओआर (प्रकरण अपराध रिपोर्ट) बनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है। लेकिन क्या केवल कागजी कार्रवाई से जंगल बच जाएंगे?



जानकारी के अनुसार, हाल ही में दरमियानी रात लगभग 10 सागौन पेड़ों की कटाई की गई। तस्कर कटे हुए लकड़ी के हिस्सों को ले जाने की तैयारी में थे, लेकिन क्षेत्र में अचानक लोगों की आवाजाही बढ़ने लगी। पकड़े जाने के डर से तस्कर लकड़ी और कटाई के निशान छोड़कर मौके से फरार हो गए। यदि उस समय लोगों की आवाजाही नहीं होती, तो संभवतः पूरी लकड़ी जंगल से बाहर पहुंच चुकी होती और विभाग को अगले दिन केवल कटे हुए ठूंठ ही देखने मिलते।

यह घटना वन सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। सवाल उठता है कि क्या संबंधित क्षेत्र में रात्रिकालीन गश्त नहीं होती? यदि होती है, तो तस्कर बार-बार उसी क्षेत्र में कैसे पहुंच रहे हैं? क्या गश्त केवल कागजों तक सीमित है? या फिर कहीं न कहीं संरक्षण की आड़ में लापरवाही, मिलीभगत या उदासीनता का खेल चल रहा है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि सागौन कोई सामान्य पेड़ नहीं है। एक मजबूत इमारती सागौन वृक्ष तैयार होने में कई दशक लग जाते हैं। सरकार वन संरक्षण और वृक्षारोपण पर करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन दूसरी ओर लकड़ी माफिया कुछ घंटों में लाखों की सरकारी संपत्ति साफ कर रहे हैं। इससे न केवल राजस्व की हानि हो रही है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। लगातार पेड़ों की कटाई से जंगल कमजोर होंगे, जलस्रोत प्रभावित होंगे और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी खतरे में पड़ेगा।

सोशल मीडिया पर मामला वायरल होने के बाद लोगों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। आमजन खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर वन विभाग और परियोजना मंडल की जिम्मेदारी क्या है? यदि बहुमूल्य सागौन के पेड़ ही सुरक्षित नहीं हैं, तो वन संरक्षण के दावे कितने मजबूत हैं?

सबसे ज्यादा सवाल परियोजना मंडल कबीरधाम की निगरानी व्यवस्था पर उठ रहे हैं। कक्ष क्रमांक 411 जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में लगातार कटाई होना सामान्य बात नहीं है। इससे साफ संकेत मिलता है कि या तो निगरानी तंत्र बेहद कमजोर है या फिर तस्करों के हौसले इसलिए बुलंद हैं क्योंकि उन्हें पकड़े जाने का डर ही नहीं है।

जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर कार्रवाई कब होगी? क्या हमेशा की तरह मामला कुछ दिनों तक चर्चा में रहेगा और फिर फाइलों में दब जाएगा? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी? या फिर केवल छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई दिखाकर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

कबीरधाम के जंगल केवल हरियाली नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर हैं। यदि समय रहते लकड़ी माफियाओं पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई और निगरानी व्यवस्था मजबूत नहीं की गई, तो वह दिन दूर नहीं जब घने सागौन वन केवल सरकारी रिकॉर्ड और पुरानी तस्वीरों तक सीमित रह जाएंगे। फिलहाल बड़ा सवाल यही है—क्या विभाग जंगल बचाएगा या लकड़ी माफियाओं के सामने यूँ ही बेबस बना रहेगा?

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