*42 गांवों के किसानों ने भरी हुंकार, जल्द होगा अनिश्चितकालीन आंदोलन का एलान; तानाशाही के खिलाफ आर-पार की जंग*
देश को कृषि प्रधान कहा जाता है, लेकिन उमरिया जिले में अन्नदाताओं की आवाज को कुचलने का गंदा खेल चल रहा है। जिला प्रशासन और कॉलरी प्रबंधन की मिलीभगत और तानाशाही पूर्ण रवैए के खिलाफ अब *भारतीय किसान संघ* ने सीधे तौर पर आर-पार की जंग का एलान कर दिया है। किसानों का आरोप है कि कॉलरी प्रबंधन कंपनी अपने रसूख, राजनीति और पैसे के दम पर गरीब किसानों की आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है, और शर्मनाक बात यह है कि इसमें स्थानीय जिला प्रशासन भी पूरी तरह सहभागिता निभा रहा है।
लेकिन शायद सत्ता और पैसे के नशे में चूर अधिकारी और कंपनी के लोग यह भूल चुके हैं कि यह देश का वो किसान है, जो जब अपनी आवाज बुलंद करता है, तो बड़े-बड़े हुक्मरानों की कुर्सियां हिल जाती हैं।
### *पर्यावरण जनसुनवाई सिर्फ एक 'ढोंग': कागजों पर हुआ खेल*
भारतीय किसान संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि पिछले दिनों *बजरंग पावर* और *गंगा कोल माइन्स कंपनी* के कार्यकलापों को लेकर जो पर्यावरण जनसुनवाई की गई थी, वह सिर्फ और सिर्फ एक औपचारिकता और ढोंग था। जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए कागजी कोरम पूरा कर लिया गया, जबकि जमीनी हकीकत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। इस फर्जीवाड़े से क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
> "प्रबंधन और प्रशासन पैसों की ताकत पर किसानों को कमजोर न समझें। जब जनता सड़क पर उतरेगी, तो इनकी तानाशाही का अंत निश्चित है।"
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### *42 गांवों की गोलबंदी, गांव-गांव बन रही रणनीति*
भारतीय किसान संघ के *जिला अध्यक्ष अभिषेक अग्रवाल* ने सीधे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि किसानों के सब्र का बांध अब टूट चुका है। जिला अध्यक्ष ने बताया कि:
* भारतीय किसान संघ अब चुप बैठने वाला नहीं है।
* क्षेत्र के *42 गांवों के किसानों को लामबंद* किया जा रहा है।
* हर गांव में चौपालें और बैठकें आयोजित कर महाआंदोलन की पुख्ता रणनीति तैयार की जा रही है।
* बहुत जल्द एक *ऐतिहासिक और अनिश्चितकालीन आंदोलन* की तारीख का एलान किया जाएगा।
### *प्रशासन की उड़ी नींद, जिम्मेदारी तय*
किसान संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि इस महाआंदोलन के दौरान यदि क्षेत्र की कानून व्यवस्था बिगड़ती है या कोई भी अप्रिय स्थिति निर्मित होती है, तो उसकी *पूर्ण जवाबदेही और जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ जिला शासन, प्रशासन और संबंधित कॉलरी प्रबंधन की होगी।*
अन्नदाताओं के इस कड़े रुख और उग्र तेवरों को देखकर अब प्रशासन और कॉलरी प्रबंधन के गलियारों में हड़कंप मचना तय माना जा रहा है।
