न्यूज़ रिपोर्टर देवकरण माली
भीलवाड़ा स्थित मानसरोवर झील प्रकरण में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी), भोपाल के आदेश से गठित संयुक्त समिति की रिपोर्ट में नगर विकास न्यास (UIT) द्वारा गंभीर अनियमितताओं, फर्जीवाड़े एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की खुली अवहेलना सामने आई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, उक्त संयुक्त समिति में जिला कलेक्टर, भीलवाड़ा के प्रतिनिधि के रूप में UIT सचिव एवं प्रदूषण नियंत्रण मंडल के क्षेत्रीय निदेशक को नियुक्त किया गया था। किन्तु दिनांक 10.03.2026 को मानसरोवर झील के निरीक्षण के दौरान UIT सचिव स्वयं उपस्थित न होकर अपने स्थान पर एक्सईएन ऋषिकेश मीणा को भेज दिया गया, वहीं प्रदूषण मंडल द्वारा भी अधिकृत अधिकारी के स्थान पर अन्य अधिकारी को भेजा गया। यह पर्यावरण प्रदूषण जैसे गंभीर विषय में केवल औपचारिकता (खानापूर्ति) का स्पष्ट उदाहरण है।
गंभीर तथ्य यह भी सामने आया कि निरीक्षण के दौरान उक्त अधिकारी मौके पर उपस्थित नहीं थे, इसके बावजूद संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर उनके हस्ताक्षर कर एनजीटी को भ्रामक एवं झूठी जानकारी प्रस्तुत की गई कि निरीक्षण उन्होंने स्वयं किया है।
इसके अतिरिक्त, UIT द्वारा मानसरोवर झील की भूमि की वास्तविक प्रकृति को छुपाते हुए भारी अनियमितता की गई है। झील/तालाब की भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में "आबादी भूमि" के रूप में दर्ज करवा दिया गया, जबकि वास्तविकता में यह झील क्षेत्र (आराजी नं. 94) है।
शिकायतकर्ता संस्था पब्लिक पावर एंड अवेयरनेस सोसायटी के प्रतिनिधि गोटू सिंह राजपूत ने बताया कि निरीक्षण के दौरान प्रदूषित जल के नमूने उनके समक्ष सील करने से भी मना कर दिया गया, जो कि प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
शिकायतकर्ता द्वारा उसी दिन जिला कलेक्टर को ईमेल के माध्यम से विरोध दर्ज कराया गया था तथा यह भी स्पष्ट किया गया था कि जिस संस्था के विरुद्ध शिकायत है, उसी को जांच समिति में शामिल करना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच के सिद्धांतों के विपरीत है। इसके बावजूद UIT सचिव को समिति से नहीं हटाया गया।
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि मानसरोवर झील के लगभग 1200 बीघा कैचमेंट क्षेत्र से सभी अतिक्रमण हटाकर झील को उसके मूल स्वरूप में पुनः स्थापित किया जाए तथा पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जाए।
