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आत्मा से प्यार करों,शरीर से नहीं - मुनि भूतबलि सागर दया करो और दया भाव रखें : NN81

 आत्मा से प्यार करों,शरीर से नहीं - मुनि भूतबलि सागर

दया करो और दया भाव रखें -


रिपोर्ट राजीव गुप्ता आष्टा जिला सीहोर एमपी



आष्टा।भगवान अनेक गुणों के भंडार है।कितनी भी भक्ति, आराधना करें,वह लघु बनकर करें। भगवान के सामने भक्त बनकर, जिनवाणी के सामने बेटा बनकर और गुरु के सामने शिष्य बनकर बैठे।आत्मा से प्यार करों,शरीर से नहीं।दया करो और दया भाव रखें। 

गुणी का गुणगान करें। गुणों का कोई अंत नहीं, भगवान अनेक गुणों से युक्त है।भक्ति भावना रखें, लघु बनकर रहने से ज्ञान बढ़ेगा।धन बढ़ने से घमंड नहीं आना चाहिए।कोयल बसंत ऋतु में बोलने के लिए मजबूर हो जाती है।गुणी व्यक्ति को देखकर विनय भाव आना चाहिए। सम्यकदृष्टि लघु होता है और स्वयं को छोटा समझता है। किसी के अवगुण है तो उन्हें ही बताएं, अन्य को नहीं और गुणी व्यक्ति के गुणगान सभी के सामने करना चाहिए। व्यक्ति को कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। 

   उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर मुनि भूतबलि सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। मुनिश्री ने कहा कि अवगुणी की खिल्ली नहीं उड़ानी चाहिए। आचरण देखें,मौन रहना सोना है, बोलने वाला चांदी है। लोगों में अज्ञानता अधिक भरी है। शाकाहारी होकर भी शाकाहार को समझ नहीं पा रहे हैं। ज्ञान का अंत होता जा रहा है और अज्ञानता बढ़ती जा रही है। भोजन और भोग में अंतर है। आत्मा को पवित्र बनाएं।


अनुराग करना है तो मोक्ष से करें, संसार से नहीं। आत्मा चैतन्य स्वरूप है। भक्ति में बहुत शक्ति है। कभी भी अहम न करें।समय से पहले नहीं मिलता। उपादान और निमित्त से काम होता है अच्छे काम काल करे सो आज करे। जिसका काम हो रहा है उसके भाग्य बलवान है और जिसका काम नहीं हो रहा उसका भाग्य बलवान नहीं है। वर्तमान में मुनि बनना जरूरी है,समवर निर्जरा जरूरी है। उचित यही है कि पुरुषार्थ करें। मुनि की सेवा करने का फल मिलता है। भाग्य पुण्य से बनता है और धर्म से दूर नहीं होना चाहिए।स्वार्थी नहीं बने। जन्म,जरा, मृत्यु की दवा सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र है।कौरव जैसा स्वार्थ नहीं,पांडव जैसा स्वार्थ रखें। विषय भोग नहीं बढ़ाए,कम करें।आज व्यक्ति की तृष्णा नहीं घट रही है।भोग का त्यागकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। तभी कल्याण होगा। सीमा बनाकर त्याग करें। मुनिश्री ने कहा समंतभद्र ने भाव निर्मल बनाकर शरीर से मोह छोड़ दिया। बच्चों को प्यार करों, लेकिन उनके मुंह में मुंह नहीं डालना चाहिए।

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