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श्मशान घाट की बदहाली; बारिश में अंतिम संस्कार तक बना चुनौती, मालखेड़ा के ग्रामीणों का फूटा आक्रोश: NN81


 

श्मशान घाट की बदहाली;  बारिश में अंतिम संस्कार तक बना चुनौती, मालखेड़ा के ग्रामीणों का फूटा आक्रोश: 

शाहपुरा (भीलवाड़ा) =  आज़ादी के 79 वर्ष बाद भी शाहपुरा तहसील की डाबला चांदा ग्राम पंचायत का मालखेड़ा गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। करीब 700 मतदाताओं वाले इस गांव में श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए पक्का रास्ता नहीं होने से ग्रामीणों को अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील कार्य में भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार गांव से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित श्मशान घाट तक जाने वाला मार्ग अतिक्रमण के कारण संकरा हो चुका है। अधिकांश रास्ता कच्चा होने से बरसात में कीचड़ और जलभराव के कारण शव यात्रा निकालना मुश्किल हो जाता है। कई स्थानों पर एक फीट तक कीचड़ जमा होने से बुजुर्गों और महिलाओं का पैदल चलना भी कठिन हो जाता है।

ग्रामीणों ने बताया कि श्मशान घाट पर टीन शेड या स्थायी छाया की व्यवस्था नहीं होने से बारिश के दौरान कई बार चिता पूरी तरह नहीं जल पाती, जिससे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया प्रभावित होती है और परिजनों की भावनाओं को गहरा आघात पहुंचता है।

श्मशान तक पहुंचने के लिए कई जगह खेतों के बीच से गुजरना पड़ता है। पहले यह क्षेत्र चारागाह था, लेकिन अतिक्रमण के चलते खेत बन जाने से अब अंतिम यात्रा निकालने में खेत मालिकों से अनुमति लेनी पड़ती है। इससे कई बार विवाद की स्थिति भी बन जाती है।

रास्ते में बबूल की झाड़ियां और कांटेदार झाड़ियां भी ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा रही हैं। अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले लोगों को दुर्गम रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है।

गांव में पेयजल संकट भी गंभीर बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि चंबल जल परियोजना की पाइपलाइन होने के बावजूद नियमित जलापूर्ति नहीं होती। चार-चार दिन और कभी-कभी सप्ताहभर तक पानी नहीं आने से लोगों को करीब तीन किलोमीटर दूर रेहड़ गांव से पानी लाना पड़ता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि श्मशान घाट तक सड़क निर्माण, अतिक्रमण हटाने, शेड निर्माण और पेयजल समस्या के समाधान के लिए कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन दिए गए, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही श्मशान घाट तक पक्का रास्ता, शेड और पेयजल व्यवस्था नहीं की गई तो गांववासी धरना-प्रदर्शन और जनआंदोलन करने को मजबूर होंगे। अब देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर समस्या का समाधान कब तक करता है।

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