पोहरी एसडीएम व पटवारी को हटाने के लिए EOW एसपी ने कलेक्टर को लिखा पत्र, लोकयुक्त में ट्रैप हुए अपने रीडर को बचाने एडीएम ने कार्यवाही को गलत बताया :
मध्यप्रदेश का शिवपुरी एकमात्र ऐसा जिला है, जहां लगभग हर महीने लोकायुक्त या ईओडब्ल्यू द्वारा रिश्वतखोरों को दबोचा जाता है। बावजूद इसके जिले में भ्रष्टाचार पर इसलिए अंकुश नहीं लग पा रहा, क्योंकि प्रशासनिक अधिकारी रिश्वतखोर आरोपियों को बचाने में जुट जाते हैं। पिछले दिनों पोहरी एसडीएम व पटवारी के खिलाफ ईओडब्ल्यू में प्रकरण दर्ज होने के बाद भी जब उन्हें पोहरी से नहीं हटाया, तो ईओडब्ल्यू के एसपी ने कलेक्टर को पत्र लिखा है। इसी तरह बीते फरवरी माह में एडीएम के रीडर को लोकायुक्त ने रंगे हाथों ट्रैप किया था, लेकिन एडीएम ने अपने रीडर को बचाने के लिए लोकायुक्त की कार्यवाही को ही गलत ठहरा कर उसे पूर्व कलेक्टर से बहाल करवा लिया था।
बीते जून माह में नपा का स्थापना बाबू 40 हजार की रिश्वत लेते लोकायुक्त ने ट्रैप किया था। पकड़े जाने के बाद बाबू ने टीम के सामने ही स्वीकार कर लिया था कि सीएमओ के कहने पर ही उसने रिश्वत मांगी थी। अभी 1 जुलाई को ईओडब्ल्यू ने पोहरी एसडीएम जेपी गुप्ता एवं पटवारी अशोक वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार अधिनियम का प्रकरण दर्ज किया। मामला दर्ज होने के बाद एसडीएम व पटवारी को हटाया नहीं गया, बल्कि जेपी गुप्ता अपने अन्य साथी अधिकारियों के साथ कलेक्टर को ज्ञापन देने पहुंच गए, तथा ईओडब्ल्यू की कार्यवाही को ही गलत ठहरा दिया। जब एसडीएम ब पटवारी को हटाया नहीं गया तो बीते 3 जुलाई को एसपी ईओडब्ल्यू ने कलेक्टर शिवपुरी को एक पत्र भेजा है, जिसमें दोनों आरोपी एसडीएम जेपी गुप्ता व पटवारी को हटाने के लिए लिखा है, ताकि वो जांच प्रभावित न कर सकें। यानि जो काम कलेक्टर को मामला दर्ज होने के बाद तत्काल करना चाहिए था, उसके लिए भी एसपी ईओडब्ल्यू को लिखना पड़ रहा है।
रीडर को बचाने एडीएम ने ऐसा दिया अभिमत:
बीते 11 फरवरी को एडीएम शिवपुरी दिनेशचंद्र शुक्ला के रीडर मोनू शर्मा को लोकायुक्त ने रिश्वत लेते हुए कलेक्ट्रेट में ही दबोच लिया था। जिसमें मोनू को सस्पेंड किया गया, तो पूर्व कलेक्टर रविंद्र चौधरी ने एडीएम से इस मामले में अभिमत मांगा गया। हमारे पास जो अभिमत का पत्र आया है, उसमें एडीएम शुक्ला ने लिखा है कि 11 फरवरी को दोपहर 12 बजे मैं शोरगुल सुनकर जब वहां पहुंचा तो मोनू शिकायतकर्ता का हाथ पकड़कर चिल्ला रहा था कि यह मेरी जेब में रुपए डाल रहा है, इसे पकड़ों। इतना ही नहीं, एडीएम ने वहां तत्समय मौजूद कर्मचारियों के नाम गवाह के रूप में लिख दिए। जबकि मोनू को लोकायुक्त की टीम ने रिश्वत लेते हुए दबोचा था। एडीएम के इस अभिमत को सच मानते हुए पूर्व कलेक्टर रविंद्र चौधरी ने मोनू को बहाल कर दिया था। इस तरह अधिकारी अपने रिश्वतखोर अधीनस्थ को बचाने के लिए लोकायुक्त की कार्यवाही को ही उल्टा बताने से परहेज नहीं कर रहे, इसलिए शिवपुरी में भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग पा रहा।

