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दवा की कतार में उम्मीदें बीमार, बागोर स्थित राजकीय अस्पताल खुद उपचार की प्रतीक्षा में.....NN81


 जिले के बागोर स्थित राजकीय चिकित्सालय इन दिनों खुद ही इलाज का मोहताज नजर आ रहा है। जहां मरीज बीमारी से लड़ने आते हैं, वहीं यहां की अव्यवस्थाएं उन्हें नई परेशानियों का “डोज” दे रही हैं। मौसमी बीमारियों के बढ़ते प्रकोप के बीच मुख्यमंत्री निःशुल्क दवा योजना मानो “धैर्य परीक्षा केंद्र” बन गई है, जहां मरीजों को दवा से पहले लंबी कतारों का कड़वा घूंट पीना पड़ रहा है।

चिकित्सालय परिसर का दृश्य किसी राहत केंद्र से ज्यादा “संघर्ष स्थल” जैसा दिखाई देता है। बीमार और कमजोर मरीज घंटों कतार में खड़े होकर अपने नंबर का इंतजार करते हैं, मानो दवा नहीं, बल्कि कोई दुर्लभ संसाधन मिलने वाला हो। और इस व्यवस्था की जड़ में है—सिर्फ एक फार्मासिस्ट का अभाव।

दरअसल, पिछले पांच दिनों से यहां के एकमात्र फार्मासिस्ट राजेश कुमार राव, जो अजमेर निवासी हैं, डेप्युटेशन पर राजकीय सैटेलाइट अस्पताल कोटड़ा (अजमेर) भेज दिए गए हैं। संयुक्त निदेशक कार्यालय द्वारा जारी आदेश के तहत उन्हें तीन माह के लिए वहां कार्यभार संभालने को कहा गया है। नतीजतन, बागोर चिकित्सालय में दवा वितरण व्यवस्था “राम भरोसे” चल रही है।

अब हालात ये हैं कि नर्सिंग स्टाफ, जिनका काम मरीजों की देखभाल करना है, उन्हें मजबूरी में फार्मासिस्ट की भूमिका भी निभानी पड़ रही है। लेकिन बिना विशेषज्ञता के दवा वितरण की यह व्यवस्था कितनी कारगर होगी, यह सवाल खुद व्यवस्था से जवाब मांग रहा है।

विडंबना यहीं खत्म नहीं होती। इस चिकित्सालय में स्वीकृत 6 डॉक्टरों के पदों में से 5 पद खाली पड़े हैं। यानी एक डॉक्टर पर 150 से 200 मरीजों का आउटडोर और रोजाना 10-12 इमरजेंसी मरीजों की जिम्मेदारी है। ऐसे में इलाज “सेवा” कम और “संघर्ष” ज्यादा बन गया है।

और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि सरकार एक ओर डेप्युटेशन पर रोक लगाने के आदेश जारी करती है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं आदेशों को दरकिनार करते हुए 27 अप्रैल 2026 को संयुक्त निदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं, अजमेर जोन द्वारा यह डेप्युटेशन आदेश जारी कर दिया जाता है। सवाल उठता है—क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?

मरीजों की स्थिति ऐसी हो गई है कि निःशुल्क दवा योजना के बावजूद उन्हें बाजार से दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं। यानी सरकारी योजना का लाभ “कागजों में मुफ्त” और जमीन पर “महंगा सौदा” बन गया है।

अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस “बीमार व्यवस्था” का इलाज कब करते हैं, या फिर बागोर चिकित्सालय यूं ही अपनी बदहाली का इलाज खुद ढूंढता।

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