एमसीबी (छ.ग.)रिपोर्ट – मनीराम सोनी | दिनांक: 17-04-2026
एमसीबी जिले के मनेन्द्रगढ़ वनमंडल की कार्यप्रणाली एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत प्रथम अपील की सुनवाई को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रथम अपील की सुनवाई हेतु जिस अधिकारी को अधिकृत बताया गया है, उसी के द्वारा मौखिक रूप से यह स्वीकार किया जा रहा है कि उन्हें न तो इस संबंध में कोई विधिवत लिखित आदेश प्राप्त हुआ है और न ही उनकी औपचारिक नियुक्ति की गई है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से प्रशासनिक पारदर्शिता और वैधानिक प्रक्रिया के पालन पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। वहीं दूसरी ओर,जब इस विषय में वनमंडलाधिकारी से चर्चा की गई, तो उनका मौखिक कथन था कि संबंधित अधिकारी को प्रथम अपीलय की सुनवाई, हस्ताक्षर, लेखन अधिप्रमाणन के पूर्ण अधिकार प्रदान किए गए हैं। इस प्रकार के परस्पर विरोधाभासी बयान पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बनाते हैं नियत तिथि पर सुनवाई नहीं—प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
दिनांक 15-04-2026 तक दोपहर 2:00 बजे प्रथम अपील की सुनवाई निर्धारित थी। इस दौरान जनकपुर से लगभग 110 किलोमीटर की दूरी तय कर जन सूचना अधिकारी समय पर उपस्थित हुए, वहीं आवेदक भी नियत समय पर पहुंचा। इसके बावजूद वनमंडलाधिकारी सुनवाई करने उपस्थित नहीं हुए। ⚖️ समय, संसाधन और अधिकार—तीनों पर आघात
इस लापरवाही के कारण न केवल शासन के समय एवं संसाधनों की क्षति हुई, बल्कि दूरस्थ क्षेत्रों से आए अधिकारियों एवं आवेदक को अनावश्यक आर्थिक बोझ और मानसिक असुविधा का सामना करना पड़ा। यह स्थिति सूचना के अधिकार अधिनियम की मूल भावना—पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्धता—के विपरीत प्रतीत होती है बड़ा सवाल
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या भविष्य में आवेदक को विधि एवं नियमों के अनुरूप पारदर्शी एवं समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित हो पाएगी, या फिर इसी प्रकार की अनिश्चितता और प्रशासनिक भ्रम की स्थिति बनी रहेगी मामला प्रशासनिक जवाबदेही और वैधानिक प्रक्रिया के पालन से जुड़ा है, जिस पर संबंधित उच्चाधिकारियों द्वारा गंभीरता से संज्ञान लिया जाना अपेक्षित है ।
