एमसीबी (छ.ग.)
रिपोर्ट - मनीराम सोनी
एमसीबी /मनेन्द्रगढ़ देश में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लागू सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का मनेन्द्रगढ़ वनमंडल में खुलेआम उल्लंघन होने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इस कानून की मूल भावना को नजरअंदाज करते हुए नागरिकों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, जब आम नागरिक जन सूचना अधिकारी (PIO) के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करते हैं, तो उन्हें स्पष्ट, तथ्यात्मक एवं अभिलेखीय जानकारी देने के बजाय गोल-मोल एवं भ्रामक उत्तर देकर औपचारिकता निभाई जा रही है। यह आचरण अधिनियम की धारा 7 का प्रत्यक्ष उल्लंघन माना जा रहा है, जिसमें समयबद्ध एवं सटीक सूचना प्रदान करना अनिवार्य है।
स्थिति और गंभीर तब हो जाती है जब आवेदक द्वारा धारा 19(1) के तहत प्रथम अपील दायर की जाती है। आरोप है कि न तो जन सूचना अधिकारी स्वयं सुनवाई में उपस्थित होते हैं और न ही प्रथम अपीलीय अधिकारी अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं। इसके स्थान पर प्रतिनिधि अधिकारियों के माध्यम से औपचारिक सुनवाई कर ली जाती है, जो कि विधिसम्मत प्रक्रिया के विपरीत है।
और भी चौंकाने वाली बात यह है कि सुनवाई के दौरान आवेदक के कथनों को आदेश पत्र (Order Sheet) में विधिवत दर्ज नहीं किया जाता। कई मामलों में बिना कथन अंकित किए ही आवेदकों से हस्ताक्षर करवा लिए जाते हैं, जो कि न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
इतना ही नहीं, यदि किसी कारणवश आवेदक या जन सूचना अधिकारी सुनवाई में उपस्थित नहीं हो पाते हैं, तो नियमानुसार अगली तिथि निर्धारित करने के बजाय एकतरफा आदेश पारित कर दिया जाता है और आवेदक को अनुपस्थित दर्शा दिया जाता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल मानी जा रही है।
सूत्रों ने यह भी खुलासा किया है कि कुछ मामलों में पद के प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए आवेदकों से खाली नोटशीट पर हस्ताक्षर कराए जाते हैं और बाद में उस पर आदेश अंकित किए जाते हैं। यदि यह आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह गंभीर प्रशासनिक अनियमितता एवं दुराचार की श्रेणी में आएगा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 19 के तहत प्रथम अपीलीय अधिकारी का यह दायित्व है कि वह निष्पक्ष सुनवाई करते हुए “स्पीकिंग ऑर्डर” अर्थात कारणयुक्त आदेश पारित करे। इन प्रावधानों की अवहेलना सीधे-सीधे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। सूत्रों का यह भी कहना है कि मनेन्द्रगढ़ वनमंडल में कुछ अधिकारी एवं कर्मचारी वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं, शायद इनका नेटवर्क राजधानी से जुड़ा हुआ है जिसके चलते प्रभाव और नेटवर्किंग के कारण आम नागरिकों के साथ उदासीन एवं असंवेदनशील व्यवहार सामने आ रहा है अब इस पूरे मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के साथ-साथ सूचना आयोग द्वारा दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। स्पष्ट है कि यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई,तो सूचना का अधिकार जैसे सशक्त कानून की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न लग सकता है ।
