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10 साल से अतिक्रमण कायम, प्रशासन मौन—काला डूंडा में फूटा ग्रामीणों का गुस्सा - NN81




गंगापुर | काला डूंडा (ग्राम पंचायत शिवरती)

काला डूंडा गांव में पिछले एक दशक से मुख्य मार्ग पर चला आ रहा अतिक्रमण अब सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। 10 साल बीत जाने के बावजूद रास्ता आज भी कब्जे की गिरफ्त में है, और जिम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं। इस मुद्दे को लेकर ग्रामीणों में जबरदस्त आक्रोश देखने को मिल रहा है।

“मिलीभगत के बिना संभव नहीं”—ग्रामीणों का बड़ा आरोप

ग्रामीणों का कहना है कि इतने लंबे समय तक मुख्य मार्ग पर अतिक्रमण बने रहना बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव ही नहीं है। लोगों का साफ आरोप है कि कहीं न कहीं जिम्मेदार अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत के चलते यह समस्या वर्षों से जस की तस बनी हुई है।

 “अगर प्रशासन चाहता तो एक दिन में रास्ता खाली हो सकता था, लेकिन यहां तो सालों से आंखें मूंद रखी हैं।”

— एक आक्रोशित ग्रामीण

 गंदगी और बदबू से नरक जैसे हालात

अतिक्रमण के साथ-साथ मार्ग पर डाली जा रही गंदगी और कचरे ने हालात को और भयावह बना दिया है। बदबू के कारण आसपास रहने वाले लोगों का जीना दूभर हो गया है।

ग्रामीणों के अनुसार, यह रास्ता अब बीमारी फैलाने का अड्डा बन चुका है, जहां मच्छर और संक्रमण का खतरा लगातार बना हुआ है।“बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है, लेकिन जिम्मेदारों को कोई फर्क नहीं पड़ता।”

सरकार की विकास योजनाएं भी इस अतिक्रमण की भेंट चढ़ती नजर आ रही हैं। गांव में चल रहा सीसी रोड निर्माण कार्य रास्ता अवरुद्ध होने के कारण धीमी गति से चल रहा है।

यह स्थिति साफ तौर पर दिखाती है कि जमीनी स्तर पर विकास के दावे कितने खोखले हैं। तीन लोगों पर सीधे आरोप, कार्रवाई की मांग तेज

ग्रामीणों द्वारा दिए गए शिकायत पत्र में शान्तिलाल, दलीचन्द और नारायण लाल सिरवी पर मुख्य मार्ग में रोड़ियाँ डालकर अतिक्रमण करने का गंभीर आरोप लगाया गया है।

ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इन व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर तुरंत रास्ता खाली कराया जाए।

 सरपंच से तहसीलदार तक चुप्पी—सवालों के घेरे में प्रशासन

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब यह मामला सरपंच से लेकर तहसीलदार तक पहुंच चुका है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

क्या प्रशासन जानबूझकर अनदेखी कर रहा है?

या फिर किसी दबाव में कार्रवाई से बचा जा रहा है?

यह चुप्पी अब खुद एक बड़ा रहस्य बनती जा रही है।

 “अब आर-पार की लड़ाई”—ग्रामीणों का अल्टीमेटम

ग्रामीण शंभू लाल सुथार, प्रहलाद सुथार और अंबा लाल सुथार ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है—

 “अगर जल्द रास्ता खाली नहीं कराया गया तो हम आंदोलन करेंगे। अब और सहन नहीं होगा।”

गांव में आंदोलन की आहट तेज हो चुकी है, और किसी भी समय यह मामला बड़ा रूप ले सकता है।

 बड़ा सवाल: कब जागेगा प्रशासन?

काला डूंडा का यह मामला अब सिर्फ एक गांव की परेशानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली की सच्चाई को उजागर कर रहा है।

जब एक मुख्य मार्ग 10 साल तक अतिक्रमण में फंसा रह सकता है, तो विकास के दावे और जिम्मेदारों की जवाबदेही पर सवाल उठना लाजिमी है।

अब सबकी नजरें प्रशासन पर टिकी हैं—

क्या कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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