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अमृतसर की पावन धरा पर छत्तीसगढ़ के पत्रकार: स्वर्ण मंदिर की आध्यात्मिक शांति से जलियांवाला बाग की शहादत तक, इतिहास के अनकहे दर्द और राष्ट्रभक्ति की गूँज - NN81



अमृतसर- दि 24 मार्च 2026

भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत पत्र सूचना कार्यालय रायपुर द्वारा आयोजित एक विशेष अंतर-राज्यीय मीडिया अध्ययन दौरे के तहत छत्तीसगढ़ के 14 सदस्यीय पत्रकार प्रतिनिधिमंडल ने आज पंजाब की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक नगरी अमृतसर का दौरा किया। इस यात्रा का उद्देश्य देश की साझा सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास के प्रति संवेदनशीलता को और अधिक प्रगाढ़ करना है। प्रतिनिधिमंडल ने अपनी इस भावुक और आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत विश्व प्रसिद्ध श्री हरमंदिर साहिब स्वर्ण मंदिर में मत्था टेककर की और उसके उपरांत जलियांवाला बाग के उस पावन स्मारक पर जाकर पुष्पांजलि अर्पित की, जिसकी मिट्टी आज भी अमर शहीदों के रक्त से महकती है।

अमृतसर की इस यात्रा ने छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के सम्मुख भारत की दो महान गाथाओं को एक साथ रख दिया—एक ओर जहाँ स्वर्ण मंदिर की आध्यात्मिक आभा ने मन को असीम शांति प्रदान की, वहीं दूसरी ओर जलियांवाला बाग की दीवारों पर खुदे गोलियों के निशान ने उस ऐतिहासिक दर्द को पुनर्जीवित कर दिया जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी थी। यह दौरा केवल एक आधिकारिक भ्रमण नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा से साक्षात्कार करने का एक मार्मिक अवसर सिद्ध हुआ।

स्वर्ण मंदिर: सर्वधर्म समभाव और शांति का वैश्विक केंद्र

छत्तीसगढ़ी मीडिया दल ने सर्वप्रथम श्री हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की चौखट पर अपना शीश नवाया। 16वीं शताब्दी में सिखों के चौथे गुरु, श्री गुरु रामदास जी द्वारा इस पवित्र स्थान की स्थापना की गई थी। इस मंदिर की वास्तुकला और इसकी नींव की कहानी ही भारतीय संवेदनशीलता की परिचायक है, क्योंकि इसकी आधारशिला एक सूफी संत साईं मियां मीर द्वारा रखी गई थी। यह स्थान इस सत्य का उद्घोष करता है कि परमात्मा का द्वार हर जाति, धर्म और संप्रदाय के लिए सदैव खुला है।

स्वर्ण मंदिर के चारों दिशाओं में बने चार प्रवेश द्वार इस बात के प्रतीक हैं कि मानवता के लिए कोई भौगोलिक या वैचारिक सीमा नहीं है। जैसे ही छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधिमंडल स्वर्णमयी गुंबद और निर्मल 'अमृत सरोवर' के समक्ष पहुंचा, वहां गूंजती पवित्र गुरबानी की लहरों ने वातावरण को एक ऐसी अलौकिक शांति से भर दिया जिसे शब्दों में बांधना असंभव है। सरोवर के शीतल जल में स्वर्ण मंदिर का प्रतिबिंब और सेवादारों का निस्वार्थ भाव भारतीय संस्कृति की उस 'सेवा' परंपरा को दर्शाता है, जो छत्तीसगढ़ की अपनी लोक संस्कृति के साथ भी गहरा सामंजस्य रखती है। यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा ने प्रतिनिधिमंडल को उस शांति और सहिष्णुता के संदेश से सराबोर कर दिया, जो आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

जलियांवाला बाग: एक राष्ट्र की अनकही टीस और सर्वोच्च बलिदान

स्वर्ण मंदिर की शांतिपूर्ण अनुभूति के पश्चात, प्रतिनिधिमंडल की पदचाप उस संकरी और ऐतिहासिक गली की ओर मुड़ी जो जलियांवाला बाग की ओर जाती है। यह वही स्थान है जहाँ 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के शुभ अवसर पर ब्रिटिश हुकूमत की बर्बरता ने इतिहास का सबसे काला अध्याय लिखा था। जैसे ही पत्रकार दल ने उस संकरे मार्ग को देखा—जिसे जनरल डायर ने अपने सैनिकों के साथ घेरकर निकास का एकमात्र रास्ता बंद कर दिया था—वातावरण में एक भारी सन्नाटा पसर गया।

जलियांवाला बाग की दीवारों पर संरक्षित किए गए गोलियों के निशान आज भी उस क्रूरता की गवाह हैं, जब दस मिनट की अंधाधुंध गोलीबारी में मासूम बच्चों, महिलाओं और पुरुषों के प्राणों की आहुति दे दी गई थी। यहाँ स्थित 'शहीदी कुआं' (Martyrs' Well) किसी को भी झकझोर देने के लिए पर्याप्त है। उस भीषण नरसंहार से बचने के लिए सैकड़ों भारतीयों ने इसी कुएं में छलांग लगा दी थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। इस कुएं की मुंडेर पर खड़े होकर पत्रकारों ने उस भयानक मंजर की कल्पना की, जब मासूमों की चीखें इन दीवारों में कैद होकर रह गई होंगी।

इस स्मारक की मिट्टी आज भी राष्ट्रवाद की अलख जगाती है। यह वह स्थान है जिसने शहीद-ए-आजम सरदार उधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों को जन्म दिया और जिसने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत कर दी। छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के लिए यह अनुभव अत्यंत हृदयविदारक था, क्योंकि उन्होंने उस भूमि को स्पर्श किया जहाँ देश की आजादी की नींव निर्दोषों के रक्त से सिंची गई थी। यहाँ की प्रत्येक ईंट और हर कोना एक ऐसी संवेदनशीलता को जन्म देता है, जो हमें उस 'स्वतंत्रता' की भारी कीमत का अहसास कराती है जिसे हम आज जी रहे हैं।

राष्ट्रीय एकता का सेतु

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन पत्र सूचना कार्यालय रायपुर द्वारा आयोजित यह दौरा 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। छत्तीसगढ़, जो अपनी शांतिप्रिय संस्कृति और जनजातीय विरासत के लिए जाना जाता है, उसके मीडिया कर्मियों का अमृतसर के ऐतिहासिक गौरव से यह रूबरू होना दोनों राज्यों के बीच एक भावनात्मक सेतु का निर्माण करता है।

इस प्रेस टूर के माध्यम से पत्रकारों को यह समझने का अवसर मिला कि कैसे विभिन्न क्षेत्रों की ऐतिहासिक पीड़ा और आध्यात्मिक विरासत एक सूत्र में पिरोई हुई है। यह दौरा न केवल विकासात्मक रिपोर्टिंग के दायरे को बढ़ाता है, बल्कि पत्रकारों की लेखनी को एक मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण भी प्रदान करता है।

प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने इस यात्रा को अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बताया, जहाँ उन्होंने एक ही दिन में भारत के दो विपरीत परंतु आवश्यक चेहरों को देखा—एक ओर स्वर्ण मंदिर की दिव्य शांति और दूसरी ओर जलियांवाला बाग का वह बलिदान, जो हर भारतीय की रगों में देशभक्ति का संचार करता है।

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