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जंगल, जड़ और जीवन: मुरतोंडा में ताड़ी कंद की आदिवासी परंपरा :-NN81



बस्तर संभाग के दक्षिणी छोर पर स्थित सुकमा जिले के अतिसंवेदनशील ग्राम पंचायत मुरतोंडा गांव आज भी अपनी परंपराओं और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए जाना जाता है। यहां के आदिवासी समुदाय का जीवन जंगल, जल और जमीन पर आधारित है। इन्हीं परंपराओं में एक महत्वपूर्ण स्थान है — 

ताड़ी कंद मूल का।


प्रकृति से जुड़ी जीवंत परंपरा


ताड़ी कंद जमीन के भीतर पाया जाने वाला जंगली कंद है, इसे जून जुलाई माह में मिट्टी को खोदकर ताड़ी के फलों को रखा जाता है तहत् पश्चात ऊपर से मिट्टी डाल कर बंद कर दिया जाता है, तीन से चार माह में कंद तैयार हो जाता हैं, दिसम्बर। माह में इसकी खोदाई शुरू होती है। जिसे स्थानीय लोग पीढ़ियों से खोजते और उपयोग करते आ रहे हैं। इसे खोजने और खोदने की एक विशेष पारंपरिक पद्धति होती है, जो बुजुर्गों से युवाओं तक ज्ञान के रूप में हस्तांतरित होती रही है।


गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि “जीवनदाता” है। ताड़ी कंद जैसे जंगली खाद्य पदार्थ कठिन समय में भोजन का सहारा बनते हैं। बरसात और ठंड के मौसम में इसकी खुदाई अधिक की जाती है।

भोजन और औषधीय महत्व

ताड़ी कंद को उबालकर या भूनकर खाया जाता है। कई ग्रामीण इसे शरीर को ताकत देने वाला मानते हैं। कुछ पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इसमें औषधीय गुण भी पाए जाते हैं।

जंगल और संस्कृति का संबंध

मुरतोंडा सहित सुकमा जिले के कई गांवों में जंगल से मिलने वाले कंद-मूल, फल-फूल केवल भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा हैं। जंगल से जुड़ी यह परंपरा आत्मनिर्भरता और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को दर्शाती है।

आज जब आधुनिकता की दौड़ तेज हो रही है, तब भी गांवों में यह परंपरा जीवित है। यह केवल भोजन जुटाने का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की सीख भी है।


जिला ब्यूरो चीफ प्रमोद कुमार नाग की रिपोर्ट।

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