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पूर्वी आदिवासी को मिली कुपोषण से राहत एवं परिवार को मिला रोजगार :-NN81





शिवपुरी (पोहरी): गरीबी, पथरीली जमीन और मजबूरी में होने वाले पलायन के बीच पोहरी ब्लॉक के आदिवासी परिवारों ने स्वरोजगार की ऐसी नई राह चुनी है, जिसने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति बदली, बल्कि उनके बच्चों को कुपोषण के चंगुल से भी बाहर निकाल लिया। यह कहानी है ग्राम पंचायत नौंहेटा खुर्द के पटपरी गांव निवासी जगन्नाथ आदिवासी की, जिन्होंने मुर्गी पालन को अपनी तरक्की और सेहत का जरिया बनाया।

15 गांवों में चल रहा अभियान: 2400 परिवारों को मिला पशुपालन विभाग के सहयोग से मुर्गीपालन 

यह बदलाव चाइल्ड राइट्स एंड यू (CRY) के सहयोग से विकास संवाद द्वारा संचालित 'समुदाय आधारित कुपोषण प्रबंधन परियोजना' के माध्यम से आ रहा है। परियोजना की व्यापकता पर जानकारी देते हुए विकास संवाद के जिला समन्वयक अजय यादव ने बताया कि, "पशुपालन विभाग के विशेष सहयोग से हमने परियोजना के अंतर्गत आने वाले पोहरी ब्लॉक के 15 ग्रामों में कुल 2400 परिवारों को चिन्हित किया है। प्रत्येक परिवार को 45-45 चूजे उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि वे न केवल अपनी आय बढ़ा सकें बल्कि उनके आहार में अंडे और मांस के रूप में प्रोटीन की मात्रा बढ़े और पोषण स्तर में सुधार हो सके।"

रोजगार न मिलने पर पलायन 

जगन्नाथ का 13 सदस्यों का बड़ा परिवार लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। उनके पास 5 बीघा पथरीली जमीन है जहाँ खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी। अक्सर फसल न होने के कारण परिवार को दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ता था। वहां न रहने का ठिकाना था और न खाने की सही व्यवस्था, जिसका सबसे बुरा असर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता था और वे अक्सर बीमार रहते थे।

कुपोषण की जंग जीती नन्ही पूर्वी

मुर्गी पालन का सबसे अच्‍छा परिणाम जगन्नाथ की पोती पूर्वी के स्वास्थ्य में दिखा। जून 2025 में 8 माह की उम्र में पूर्वी गंभीर कुपोषित थी और उसका वजन मात्र 5 किलो 600 ग्राम था। पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) से इलाज के बाद घर लौटने पर उसे नियमित रूप से एक अंडा खिलाना शुरू किया गया। प्रोटीन युक्त आहार का असर यह हुआ कि कुछ ही महीनों में पूर्वी स्वस्थ होकर सामान्य श्रेणी में आ गई। 14 माह की उम्र में पूर्वी का वजन 8 किलो 100 ग्राम है आज पूर्वी बिल्कुल स्वस्थ हो गई। 

आर्थिक मजबूती: अब गांव में ही रोजगार

आर्थिक रूप से भी जगन्नाथ अब सशक्त हुए हैं। उन्होंने 15 मुर्गियों को 500 से 800  रुपये  तक मुर्गा बेचकर 10 हजार रुपये की आय अर्जित की। इन पैसों का उपयोग उन्होंने परिवार की जरूरतों और बीमारियों के इलाज में किया।

परिवार के लोगों ने पिछले 3 सालो मे लगातार अंडे खाये जो बाजार से खरीद कर कभी नहीं खा पाते जो लगभग7 हजार के अंडे खा लिए मुर्गी पालन से हमारे पोषण रोजगार और स्वास्थ्य में बहुत ही फायदा हुआ है

मध्यप्रदेश शिवपुरी से नितिन राजपूत जिला ब्यूरो 

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