लोकेशन नारायणपुर छत्तीसगढ़
संवाददाता खुमेश यादव
नारायणपुर/ मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने नारायणपुर प्रवास के दौरान 'गढ़बेंगाल घोटुल' पहुँचकर बस्तर की गौरवशाली परंपराओं और लोक-संस्कृति के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि और ग्रामीणों के आत्मीय स्वागत के बीच मुख्यमंत्री स्वयं लोक-रंग में रंगे नजर आए। इस दौरान उन्होंने घोटुल की अनूठी स्थापत्य कला का अवलोकन किया और बस्तर की विभूतियों से मुलाकात कर उनका उत्साहवर्धन किया।
इको-फ्रेंडली घोटुल: आदिवासी वास्तुकला का जीवंत उदाहरण
वन विभाग और पद्मश्री पंडीराम मंडावी के मार्गदर्शन में निर्मित यह घोटुल पूर्णतः इको-फ्रेंडली (लकड़ी, मिट्टी और बांस) सामग्री से बना है। मुख्यमंत्री ने घोटुल के खंभों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी की मुक्तकंठ से प्रशंसा की, जिसे स्वयं पद्मश्री पंडीराम मंडावी ने उकेरा है।
मुख्यमंत्री ने घोटुल परिसर के विभिन्न कक्षों का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया:
* लेय्योर एवं लेयोस्क कुरमा: युवाओं और युवतियों के लिए निर्मित अलग-अलग कक्ष।
* बिडार कुरमा: पारंपरिक वेशभूषा, प्राचीन वाद्ययंत्र एवं सांस्कृतिक सामग्रियों का संग्रह।
* सगा कुरमा: यहाँ मुख्यमंत्री ने बस्तर के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लेकर क्षेत्र की खान-पान संस्कृति का सम्मान किया।
बस्तर की विभूतियों और 'टाइगर बॉय' के परिजनों से आत्मीय भेंट
मुख्यमंत्री ने इस प्रवास को केवल एक औपचारिक दौरा न रखते हुए इसे एक आत्मीय मिलन का रूप दिया। क्षेत्र की महान प्रतिभाओं— वैद्यराज पद्मश्री हेमचंद मांझी, पद्मश्री पंडीराम मंडावी और सुप्रसिद्ध लोककलाकार बुटलू राम से भेंट कर उनका सम्मान किया।
संस्कार केंद्र के रूप में घोटुल का पुनरुद्धार
मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि घोटुल प्राचीन काल से ही आदिवासी समाज के लिए 'शैक्षणिक एवं संस्कार केंद्र' रहा है। चेंद्रु पार्क के समीप स्थित यह आधुनिक घोटुल न केवल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ेगा, बल्कि देश-दुनिया के पर्यटकों को भी आदिवासी जीवनशैली और सामाजिक व्यवस्था से परिचित कराने का सशक्त माध्यम बनेगा।
गढ़बेंगाल का यह घोटुल हमारी गौरवशाली विरासत को सहेजने का प्रतीक है। हमारी सरकार बस्तर की इस अनूठी संस्कृति, परंपरा और ज्ञान को संरक्षित करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। श्री विष्णुदेव साय, मुख्यमंत्री
मुख्य आकर्षण
* नक्काशी: मुख्य द्वार और खंभों पर आदिवासी कला की बारीक कारीगरी।
* सांस्कृतिक जुड़ाव: पारंपरिक लोक नृत्यों के साथ मुख्यमंत्री का भव्य अभिनंदन।
* विरासत का संरक्षण: आदिवासी ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रभावी प्रयास।
