महाराष्ट्र नंदुरबार ( जाविद शेख )
पिछले करीब 47 वर्षों से जामिया अक़लकुवा देशभर में शिक्षा, स्वास्थ्य, जनकल्याण और मानव सेवा के क्षेत्रों में बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सेवाएँ दे रहा है। शिक्षा, रोज़गार, इलाज, पानी, अनाज, आवास और प्राकृतिक आपदाओं में राहत जैसी कई जिम्मेदारियाँ जो असल में सरकार की होती हैं, उन्हें भी यह संस्था लगातार निभाती आई है। इंसानियत को आधार बनाकर सेवा करने वाली यह संस्था राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान की हकदार है।
दुर्भाग्य की बात है कि पिछले दो वर्षों से जामिया अक़लकुवा को लगातार निशाना बनाया जा रहा है और इसे बदनाम करने की संगठित कोशिशें जारी हैं। जिन लोगों की अपनी साख संदिग्ध है, उन्हीं के आरोपों को आधार बनाकर एक भरोसेमंद राष्ट्रीय संस्था पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
एफसीआरए मामले का सच
एफसीआरए की रद्दीकरण के बारे में जो तस्वीर पेश की गई, वह हकीकत से बिल्कुल अलग है। कश्मीर में कंबल वितरण को गलत रूप दिया गया, जबकि कंबल नंदुरबार के एक व्यापारी से खरीदे गए थे, भुगतान बैंक से हुआ था और ई-वे बिल पर दर्ज संस्थान का एफसीआरए रद्द होना ही विवाद की वजह बना। जामिया ने सुप्रीम कोर्ट के वकील के माध्यम से पूरा तथ्य रखा कि न उस संस्था को कोई पैसा दिया गया, न उसका कोई संबंध था। सिर्फ सामान भेजा गया था। पूरी जानकारी देने के बावजूद बातों को नजरअंदाज कर दिया गया।
खालिद ख़ज़मी यमनी का मामला
उन्हें वैध वीज़ा पर भारत लाया गया था। वीज़ा पूरा होने के बाद यमन की खराब स्थिति और उड़ानें बंद होने के कारण सिर्फ 10 दिनों का ओवरस्टे हुआ। इसके बावजूद उन पर गलत धाराएँ लगाकर जेल भेज दिया गया। बाद में जबलपुर हाईकोर्ट ने उन्हें यमन कॉन्सुलेट मुंबई के सुपुर्द किया और पूरा कानूनन प्रक्रिया अक़लकुवा में संपन्न हुई। इसके बाद भी दोबारा गिरफ्तारी कर ली गई और जामिया के बानी मौलाना गुलाम मोहम्मद वसतानी और उनके उत्तराधिकारी मौलाना हुजैफा को बेबुनियादी तरीके से इस मामले में शामिल किया गया। गंभीर बीमारी में भी मौलाना को पुलिस के सामने पेश होना पड़ा।
खदीजा खालिद का मामला
एक यमनी महिला अपने दूध पीते बच्चे के साथ शरणार्थी के रूप में भारत में रह रही थीं। उन्हें पूछताछ के नाम पर जेल भेज दिया गया और बच्चे को माँ से अलग कर दिया गया। बाद में कोर्ट से जमानत मिली। इस व्यवहार ने मानवता को शर्मसार कर दिया।
आधार कार्ड का मामला
पूरा काम कानूनी नियमों के तहत किया गया। बच्चों की शिक्षा के लिए अनुमति लेकर प्रवेश दिया गया। पुराने कानून के अनुसार 180 दिनों के ठहराव के बाद आधार बन सकता था। इन्हीं आधारों पर बच्चों के आधार बने, जिनमें यमनी नागरिकता स्पष्ट दर्ज थी। बाद में इन्हीं आधारों पर यमन दूतावास ने बच्चों को पासपोर्ट जारी किए। जन्म के सभी दस्तावेज भी अदालत के हलफनामे पर पूरे किए गए।
जामिया की शैक्षणिक सेवाएँ
जामिया के स्कूल और कॉलेजों में 30 प्रतिशत से अधिक गैर मुसलमान छात्र पढ़ते हैं। पिछले 30 सालों में लगभग 9000 गैर मुस्लिम छात्र डॉक्टर, इंजीनियर, फार्मासिस्ट, आईटीआई, नर्सिंग, बीएड, एसएससी और एचएससी जैसे क्षेत्रों में सफल होकर देश की सेवा कर रहे हैं। इसलिए स्थानीय स्तर पर जामिया के खिलाफ कोई ठोस समर्थन नहीं मिल पाया।
झूठे प्रोपेगंडे के जरिए मामला ईडी तक ले जाया गया, मगर जामिया से कोई गैरकानूनी रकम नहीं मिली। दो अलग-अलग ट्रस्टीयों के निजी मामलों को जामिया से जोड़कर गलत कहानी बनाई गई।
अंत में
अगर इस देश में शिक्षा देना, इलाज कराना, पानी-अनाज पहुंचाना, ठंड में कपड़े देना, आपदा में लोगों की मदद करना, अस्पताल और शिक्षण संस्थान चलाना और यतीम-बीवाओं की सहायता करना अपराध है, तो फिर हर मददगार व्यक्ति अपराधी ठहरता है।
मौलाना गुलाम मोहम्मद वसतानी की सेवाएँ इतनी बड़ी हैं कि अगर सरकार सच में शिक्षा-हितैषी होती, तो उन्हें सम्मानित करती, न कि बेबुनियाद आरोपों को हवा देती।
ज़रूरत है कि जनता तक सही हकीकत पहुँचे, ताकि इस नेक संस्था के साथ हो रही नाइंसाफी रोकी जा सके।
अल्लाह तआला इस संस्था की हिफाजत करे और जल्द न्याय कायम करे।
