मोहम्मद फारुक खामगाव
जिला बुलढ़ाणा महाराष्ट्र
देश को आजाद हुए 77 साल बाद भी जलगांव जामोद तहसील के यह चार गांव विकास से कोसों दूर है सातपुड़ा पहाड़ी पर घने जंगल में बसे इन चार गांव के आदिवासी आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है ऐसा महसूस नहीं होता है कि यह चार गांव आजाद भारत देश में मौजूद है हम चांद पर पहुंचने के रिकॉर्ड भी कायम कर रहे हैं लेकिन इन 4 गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने आज भी बेबसी का आलम है पीढ़ी दर पीढ़ी से आदिवासी समाज इन 4 गांव में जिंदगी गुजार रहे हैं इन गांव में आज भी ना पीने का पानी उपलब्ध नहीं है , ना ही सड़क है और ना ही बिजली की सुविधा उपलब्ध है एक तरफ कहते हैं हमारा देश डिजिटल बन रहा है सबका साथ सबका विकास यह नारा भी लोगों को केवल गुमराह कर बेवकूफ बनाने का नारा है क्योंकि इन गांव में विकास नहीं हुआ है सांसद, विधायक और विभिन्न पार्टियों के राजनेताओं ने जलगांव जामोद तहसील अंतर्गत भिंगारा , चालीस टापरी, गोमाल-1 ,गोमाल-2 जैसे-आदिवासी गांवों पर ध्यान ही केंद्रित नहीं किया केवल उन्होंने आश्वासन की चॉकलेट ही दी है
इन 4 गांव के आदिवासियों का कहना है कि 5 साल के बाद ही चुनाव के समय नेताओं के चेहरे इन गांव में नजर आते हैं
यह आदिवासी खुंखार जंगली जानवरों के बीच से गुजरकर बड़ी कठिनाइयों के चलते भिंगारा पहुंच पाते हैं यह आदिवासी लोग मरिज या गर्भवती महिला को तथा अन्य मरीज को भिंगारा तक एक बांस पर चादर या कपड़ा बांधकर डोली की तरह उठा कर लाते हैं आधुनिक डिजिटल के दौर में यह बड़े शर्म की बात है ऐसी जानकारी राधे श्याम खरात , सरदार अवासे, देवदास डावर , नंदू सोलंकी , सुमार सिंह मुझालदा , उमेश चौगल , मांगीलाल सोलंकी ने दी
मोहम्मद फारुक खामगांव
