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मातृभूमि की पुकार: कोरिया के युवा साहित्यकार संवर्त कुमार ‘रूप’ ने कविता के माध्यम से उठाई सड़क चौड़ीकरण व समग्र विकास की मांग - NN81






एमसीबी (छ.ग.)                  

रिपोर्ट - मनीराम सोनी          

कोरिया जिला इन दिनों अव्यवस्था, जाम, आधारभूत सुविधाओं के अभाव और विकास की धीमी गति से जूझ रहा है। शहर की बहुप्रतीक्षित सड़क चौड़ीकरण की मांग वर्षों से लंबित है, जिससे आम जनता को रोजाना परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में जिले के युवा साहित्यकार, वर्ल्ड रिकॉर्डधारी कवि संवर्त कुमार ‘रूप’ ने अपनी सशक्त कविता और लेखनी के माध्यम से मातृभूमि कोरिया की व्यथा को आवाज़ दी है।


रूप द्वारा रचित विस्तृत कविता “कोरिया… धरती कहे पुकार के” में कोरिया की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक संपन्नता का वर्णन करते हुए वर्तमान परिस्थितियों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। उन्होंने सड़क चौड़ीकरण, शहर के असंगठित विकास, यातायात समस्या, पर्यटन ठहराव, व्यापारिक गिरावट तथा युवाओं के पलायन जैसी चुनौतियों को भावनात्मक शब्दों में पिरोया है।



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कोरिया की तकदीर बदलने की पुकार


रूप का कहना है कि कोरिया जिला कभी अपनी प्राकृतिक समृद्धि, खनिज संसाधनों, ऐतिहासिक धरोहरों और पर्यटन स्थलों के लिए जाना जाता था, किंतु विभाजन के बाद जिले का संकुचित स्वरूप और संसाधनों की कमी ने इसके विकास को बाधित कर दिया।


बैकुंठपुर शहर की सबसे बड़ी समस्या—सड़क चौड़ीकरण—पर उन्होंने विशेष ध्यान आकर्षित किया। जाम की स्थिति से


मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते,


प्रसूता एम्बुलेंस में ही बच्चे जन्म दे रही हैं,


परीक्षार्थी परीक्षा केंद्र नहीं पहुंच पाते,


त्योहारों, जुलूसों और आयोजनों में अव्यवस्था पनपती है,


नाबालिगों की तेज रफ्तार व सड़क पर मवेशियों के कारण दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।



बायपास बन जाने से शहर का व्यापार भी कम हो गया है, जिसके कारण स्थानीय व्यापारी नुकसान झेल रहे हैं।



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साहित्य ने फिर निभाई अपनी भूमिका


राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां उद्धृत करते हुए रूप ने कहा—

“जब राजनीति लड़खड़ाती है तब साहित्य उसे संभालता है।”

उन्होंने बताया कि इतिहास गवाह है—जब समाज दिशाहीन होता है, साहित्य ही उसे चेताता है।


दिनकर के समर-गीत का हवाला देते हुए उन्होंने तटस्थता को अपराध बताया और नागरिकों से अपनी मातृभूमि कोरिया के विकास हेतु खड़े होने की अपील की।


उनके अनुसार,

“अब अनुनय–विनय से मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास है, पर यदि सुधार नहीं हुआ तो भविष्य हमें दोषी न ठहराए इसके लिए आवाज़ बुलंद करना पड़ेगा।”


उन्होंने दिनकर की पंक्तियों के साथ अपनी बात को सार्थक बनाते हुए कहा—

“याचना नहीं, अब रण होगा—

जीवन जय या कि मरण होगा।”



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कवि की अपील: उठो, जागो और कोरिया के भविष्य को संवारो


रूप ने अपनी कविता के माध्यम से कोरिया के युवाओं को संदेश दिया कि—

सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, रोजगार और यातायात जैसी व्यवस्थाएं सुधारना आवश्यक है।

यदि आज कोरिया के निवासी मिलकर एकराय नहीं बने, तो आने वाली पीढ़ियां पीछे छूट जाएंगी।

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