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जगतगुरु शंकराचार्य जी ने कहा – श्रीराम सनातन धर्म के आदर्श, कुल उत्थान ही सच्चा धर्म-NN81

परमहंसी गंगा आश्रम, (विशेष संवाददाता)।


जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने चातुर्मास प्रवचन के अंतर्गत वाल्मीकि रामायण का विशद वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम केवल अयोध्या के ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सनातन धर्म के लिए आदर्श पुरुष हैं। वे भारतीय संस्कृति के दर्पण हैं, जिनसे हमें आचरण, कर्तव्य और धर्म का मार्ग मिलता है।


महाराजश्री ने सनातन परंपराओं की ओर संकेत करते हुए कहा

 "आज हमारे समाज

में शिखा, सूत्र,गणवेश,

संध्या-पूजन,जप-तप जैसीअनिवार्य परंपराएँ

धीरे-धीरे क्षीण हो

रही हैं। यह आवश्यक

है कि हम अपने

वर्णानुसार आचरण

करें और अपने कुल

के उत्थान पर चिंतन

करें, क्योंकि कुल की

उन्नति ही व्यक्ति की

सच्ची पहचान है।"

बाल्मीकि रामायण से पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के प्रवचन

भरत-राम मिलन का वर्णन

जब श्रीराम वनवास पर गए, अयोध्या में महाराज दशरथ का देहांत हो गया। भरत ननिहाल (कैकय देश) में थे। जब उन्हें यह समाचार मिला तो वे तत्काल अयोध्या लौटे। वहां उन्होंने देखा कि अयोध्या महलों के बीच भी श्मशान जैसी उदासी छाई हुई है। पिता का निधन, भाई राम का वनवास और माता कैकयी के कारण इस विपत्ति का आना  यह सब जानकर भरत शोकाकुल हो उठे।


माता कैकयी से संवाद

भरत ने माता कैकयी से कहा –

"मां! पिताजी कहां हैं?"कैकयी ने उत्तर दिया – "वे परमपद को प्राप्त कर चुके हैं।"फिर भरत ने पूछा – "राम-लक्ष्मण कहां हैं?"कैकयी ने उत्तर दिया – "मेरे दो वरदानों के कारण वे वन गए हैं।"


यह सुनकर भरत का हृदय फट गया। उन्होंने अपनी माता को बहुत धिक्कारा और कहा –मां! तुमने जो किया है, वह न केवल पितृवंश का नाश है बल्कि सम्पूर्ण अयोध्या का दुःख है।"वनगमन का निश्चय


भरत ने प्रण किया कि 

"यदि श्रीराम वन में हैं तो मैं भी वन जाऊंगा और अपने प्रभु, अपने भैया राम को अयोध्या वापस लाऊंगा। मैं सिंहासन को राम के बिना स्वीकार नहीं करूंगा।"इसके बाद भरत अयोध्या के समस्त मंत्रियों, गुरुजनों, माताओं और नगरवासियों के साथ वन की ओर प्रस्थान कर गए। उनके साथ विशाल सेना और वाहन भी चल पड़े।

निषादराज मिलन

वनमार्ग में भरत की भेंट निषादराज गुह से हुई। निषादराज श्रीराम के परम भक्त थे। उन्होंने भरत को देखकर पहले संदेह किया कि कहीं भरत भी कैकयी की तरह छल करने तो नहीं आए हैं। लेकिन जब भरत ने सत्य और धर्म का उद्घोष किया तो निषादराज के नेत्र भर आए। उन्होंने कहा –

"राजकुमार! आप भी राम जैसे धर्मात्मा हैं। आइए, मैं आपको राम तक ले चलता हूँ।"

भरत-राम मिलन

अंततः भरत अपने गुरु व माताओं के साथ चित्रकूट पहुंचे। वहां उन्होंने श्रीराम को देखा।

भरत भूमि पर दण्डवत होकर गिर पड़े और रोते हुए बोले 

"भैया राम! आप पिता के आज्ञाकारी पुत्र हैं, परंतु आप पर अन्याय हुआ है। अयोध्या की प्रजा आपके बिना अनाथ हो गई है। आइए, अयोध्या चलें और राजगद्दी स्वीकार करें।"

श्रीराम ने भरत को उठाया, गले से लगाया और कहा

"भरत! यह सब पिताजी की आज्ञा और धर्मपालन का प्रश्न है। मैं पिताजी के वचन का पालन करने आया हूं। मुझे 14 वर्ष का वनवास पूरा करना ही होगा।"

भरत की प्रार्थना और खड़ाऊं

भरत ने कहा –"यदि आप अयोध्या नहीं चलेंगे तो मैं राज्य कैसे लूं? आप ही अयोध्या के स्वामी हैं।तब श्रीराम ने अपनी खड़ाऊं भरत को सौंप दीं और कहा –भरत! इन खड़ाऊं को राजगद्दी पर रखकर राज्य चलाना। मैं वनवास से लौटकर स्वयं गद्दी संभालूंगा।"


भरत ने सिर झुकाकर उन पवित्र खड़ाऊं को स्वीकार किया और संकल्प लिया कि –"जब तक राम लौटकर नहीं आते, मैं स्वयं महलों में नहीं रहूंगा। मैं तपस्वी जीवन व्यतीत करूंगा और केवल इन खड़ाऊं के माध्यम से ही राज्य का संचालन करूंगा।" इस प्रकार भरत-राम मिलन भारतीय संस्कृति में भाईचारे, त्याग और धर्मपालन की सर्वोत्तम मिसाल है।पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने इस प्रसंग से यह संदेश दिया कि –"परिवार, समाज और राष्ट्र का उत्थान तभी संभव है जब व्यक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ छोड़कर धर्म और सत्य को सर्वोपरि माने।"

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