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जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज ने सुनाया पंचवटी प्रसंग-NN81

 न्यूज़ नेशन 81 झोतेश्वर नरसिंगपुर

संजय साहू 9424997503


परमहंसी गंगा आश्रम में गुंजे रामकथा के स्वर

परमहंसी गंगा आश्रम में चातुर्मास के दौरान द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज ने बाल्मीकि रामायण का प्रसंग सुनाते हुए धर्म, धन और जीवन के गूढ़ तत्वों पर प्रकाश डाला।

महाराजश्री ने कहा 

“धर्म का मूल उद्देश्य आत्मकल्याण और समाज कल्याण है। धन का अर्जन तभी सार्थक है जब उसका उपयोग धर्म के लिये किया जाये। धर्म पालन हेतु धन आवश्यक है, परंतु धनार्जन सदैव धर्मसम्मत होना चाहिए। मनुष्य को अपने शरीर की रक्षा केवल भोग के लिये नहीं, बल्कि तत्व-जिज्ञासा और ब्रह्मविद्या की साधना के लिये करनी चाहिए। जहाँ ब्रह्मविद्या प्रकाशित होती है, वही भारत है। वेदान्त कहता है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर अपूर्व ज्ञान छिपा हुआ है, जैसे बल्ब में विद्युत छिपी रहती है।”

इसके बाद पूज्य महाराजश्री ने रामायण का पंचवटी प्रसंग सुनाया


श्रीराम, सीता और लक्ष्मण जब पंचवटी में निवास कर रहे थे, तभी शूर्पणखा वहाँ पहुँची। उसकी दुष्ट प्रवृत्ति को देखकर लक्ष्मणजी ने उसका नासिका-कर्ण काट दिया।

महाराजश्री ने सुंदर उदाहरण देते हुए कहा:

“जैसे आकाश में पतंग उड़ती है और उसकी डोर कटते ही वह धरती पर गिर जाती है, वैसे ही शूर्पणखा की नाक कटने के साथ ही उसका अभिमान और दुष्टता भी धराशायी हो गई। यह प्रसंग बताता है कि अधर्म और कामवासना का परिणाम सदैव अपमान और पतन ही होता है।”

 अपमानित होकर शूर्पणखा ने अपने भाइयों खर-दूषण को उकसाया। वे 14 हज़ार राक्षसों की सेना लेकर युद्ध के लिये आए।

भगवान श्रीराम ने अकेले ही सबका संहार कर दिया। महाराजश्री ने कहा –

“धर्म की रक्षा के लिये कभी-कभी कठोरता आवश्यक होती है। जब अन्याय और अधर्म बढ़ता है, तब भगवान स्वयं उसका अंत करते हैं।”

शूर्पणखा ने यह समाचार रावण को सुनाया। रावण क्रोध में भरकर सीताहरण का षड्यंत्र रचने लगा और मारीच के पास पहुँचा। रावण ने उसे स्वर्णमृग का रूप धारण करने का आदेश दिया। मारीच ने बहुत समझाया कि यह कार्य हितकारी नहीं है, परंतु रावण अपनी दुराग्रहवश नहीं माना।

शंकराचार्य जी महाराज ने कहा 

“रामायण का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब मनुष्य दुराग्रह में आकर सत्य और हितकारी वचनों को अस्वीकार करता है, तब उसका पतन निश्चित होता है। मारीच ने उचित परामर्श दिया, परंतु रावण ने उसे नहीं माना और उसी के परिणामस्वरूप लंका का विनाश हुआ।”

अंत में पूज्य महाराजश्री ने कहा 

“मनुष्य को सदैव धर्ममार्ग पर चलना चाहिए। धर्म से ही जीवन की सार्थकता है। धर्म के बिना धन और राज्य वैभव निरर्थक है।”भक्तों की भावनाएँप्रवचन के दौरान अनेक श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

 बुजुर्ग श्रद्धालु ने कहा

“महाराजश्री के मुख से रामकथा सुनना ऐसा लगता है मानो हम स्वयं पंचवटी में उपस्थित हों।”

युवा भक्तों ने कहा कि उन्हें कथा से जीवन में धर्म और संयम के महत्व का बोध हुआ।

आश्रम का पूरा वातावरण भगवान के नाम से गूंज उठा। कथा के अंत में सामूहिक आरती हुई और भक्तों ने “जय श्रीराम” के नारे लगाते हुए वातावरण को दिव्यता से भर दिया।

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