संवाददाता – ऐश्वर्य सुमित मिश्रा
बैनगंगा की आड़ में नियमों की अनदेखी? सिंचाई विभाग की अनुमति पर उठे गंभीर सवाल, जनप्रतिनिधियों से जवाब मांग रहे नागरिक, सांसद-विधायक बताएं, आखिर किस नियम के तहत डूब क्षेत्र में कराया गया उत्खनन?
सिवनी जिले की छपारा तहसील स्थित बैनगंगा नदी के संजय सरोवर बांध के डूब क्षेत्र में हुए सिल्ट उत्खनन का मामला अब केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। नागरिकों का कहना है कि यदि क्षेत्र में पर्यावरण, सिंचाई और सरकारी भूमि से जुड़े इतने बड़े निर्णय लिए जा रहे थे, तो क्षेत्र के सांसद और विधायक आखिर मौन क्यों रहे?
आरोप है कि सिंचाई विभाग के कार्यपालन यंत्री द्वारा नगर परिषद छपारा को ऐसी अनुमति जारी की गई, जिस पर सिंचाई विभाग के नियमों, नगर पालिका अधिनियम तथा पर्यावरणीय प्रावधानों के उल्लंघन की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बांध के डूब क्षेत्र में सिल्ट हटाने अथवा नदी तल में हस्तक्षेप के लिए विस्तृत तकनीकी परीक्षण, सक्षम स्तर की स्वीकृति, पर्यावरणीय पहलुओं का परीक्षण तथा निर्धारित कार्ययोजना आवश्यक होती है। ऐसे मामलों में केवल स्थानीय स्तर पर अनुमति जारी करना कई गंभीर कानूनी सवाल खड़े करता है।
सिंचाई विभाग के नियमों पर उठे सवाल
सिंचाई विभाग के अधीन आने वाले जलाशयों, बांधों और डूब क्षेत्रों की भूमि सार्वजनिक संपत्ति मानी जाती है। इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार का उत्खनन, भूमि परिवर्तन अथवा सिल्ट निष्कासन विभागीय प्रक्रिया, उच्च स्तरीय स्वीकृति और तकनीकी मानकों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए। यदि अनुमति जारी करते समय इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया, तो इसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अनुमति मिलते ही भारी मशीनों से बड़े पैमाने पर उत्खनन शुरू हो गया, लेकिन न तो सिंचाई विभाग ने प्रभावी निगरानी की और न ही नगर परिषद ने स्थल पर कोई जिम्मेदार अधिकारी तैनात किया। इससे यह आशंका और गहरा गई कि पूरी प्रक्रिया बिना पर्याप्त नियंत्रण के संचालित हुई।
नगर पालिका अधिनियम की भावना पर भी प्रश्न
नगर पालिका अधिनियम के अंतर्गत नगर परिषद का दायित्व सार्वजनिक संपत्ति, पर्यावरण संरक्षण तथा नागरिक हितों की रक्षा करना है। यदि नगर परिषद, छपारा द्वारा ऐसे कार्य कराए गए जिनसे नदी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो, सरकारी भूमि पर मिट्टी का अनियोजित डंपिंग हो या भविष्य में अतिक्रमण की आशंका उत्पन्न हो, तो यह अधिनियम की मूल भावना के विपरीत माना जाएगा।
आरोप है कि नदी से निकाली गई सैकड़ों डंपर मिट्टी किसानों को उपलब्ध कराने के बजाय नदी किनारे सरकारी भूमि पर ही डंप कर दी गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे भविष्य में स्थायी अतिक्रमण की आशंका बढ़ गई है।
जनसुनवाई का आवेदन भी बना रहस्य
23 जून को कलेक्टर जनसुनवाई, सिवनी में मनीष तिवारी, राकेश नागफासे और सुदीप तिवारी ने आवेदन देकर पूरे मामले की जांच, अवैध डंपिंग हटाने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन पखवाड़े बाद भी आवेदन संबंधित कार्यालय तक नहीं पहुंचने का दावा किया जा रहा है। कार्यपालन यंत्री पी.एन. नाग स्वयं कह रहे हैं कि शिकायत उनके पास नहीं आई। इससे जनसुनवाई व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं
सांसद-विधायक से जनता के सवाल
नागरिक पूछ रहे हैं—
- क्या डूब क्षेत्र में हुए इस उत्खनन की जानकारी क्षेत्रीय सांसद और विधायक को थी?
- यदि जानकारी थी तो उन्होंने पर्यावरण और सरकारी भूमि की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए?
- यदि जानकारी नहीं थी तो उनके क्षेत्र में इतने बड़े कार्य की निगरानी व्यवस्था आखिर कैसी है?
- क्या जनप्रतिनिधि पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग करेंगे?
पर्यावरण से समझौता नहीं होना चाहिए
आवेदकों ने मांग की है कि बैनगंगा नदी के डूब क्षेत्र में जमा की गई मिट्टी तत्काल हटाई जाए, पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए तथा यदि किसी अधिकारी ने नियमों से परे जाकर अनुमति जारी की है तो उसके विरुद्ध विभागीय एवं वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही जनसुनवाई की शिकायतों के निस्तारण में हो रही देरी की भी जवाबदेही तय की जाए।
इनका कहना है
"जनसुनवाई की शिकायत मेरे पास आई ही नहीं है। हो सकता है भेजी गई हो लेकिन पहले सिवनी डिवीजन में गई होगी। वहां से शायद हमारे पास आएगी।"
— **पी.एन. नाग, कार्यपालन यंत्री, सिंचाई विभाग

