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कोयलारी कला में कागज़ी चेक डैम! 19.412 लाख खर्च, स्थल पर जल संग्रह असंभव — सूचना पटल भी नियमों के विपरीत.....NN81



राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत ग्राम पंचायत कोयलारी कला, जनपद पंचायत पंडरिया, जिला कबीरधाम में “चेक डैम निर्माण” कार्य कराया गया है। स्थल पर लगाए गए नागरिक सूचना पटल में उल्लेख है कि कार्य का नाम “चेक डैम निर्माण”, स्वीकृत लागत लगभग 19.412 लाख रुपये, कार्य प्रारंभ तिथि 14.03.2026 तथा पूर्णता तिथि 13.04.2026 दर्ज है। बोर्ड में योजना कोड, प्रशासकीय स्वीकृति क्रमांक, 261 मानव दिवस, संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों के नाम एवं मोबाइल नंबर भी अंकित किए गए हैं।


लेकिन जमीनी हकीकत बोर्ड पर लिखी बातों से बिल्कुल उलट नजर आती है। जिस स्थान पर यह निर्माण किया गया है, वहां प्राकृतिक ढलान और मिट्टी की बनावट ऐसी है कि बरसात में भी बूंद भर पानी रुकना संभव नहीं दिखता। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यहां पूर्व में भी जल ठहराव नहीं होता था और वर्तमान संरचना भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी।


सबसे चिंताजनक बात यह है कि लगाया गया नागरिक सूचना पटल भी नियमानुसार नहीं बनाया गया है। बोर्ड का प्रारूप अधूरा और त्रुटिपूर्ण है। कई जानकारियां अस्पष्ट, अपूर्ण या गलत तरीके से लिखी गई हैं। कार्य की वास्तविक तकनीकी जानकारी—जैसे खुदाई की निर्धारित गहराई, चौड़ाई, उपयोग की गई सामग्री की मात्रा—स्पष्ट रूप से अंकित नहीं है। साथ ही महात्मा गांधी और मनरेगा का चिन्ह भी प्रदर्शित नहीं किया गया है । इससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं और संदेह गहराता है कि सूचना केवल खानापूर्ति के लिए प्रदर्शित की गई है।


ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि मनरेगा जैसी श्रम आधारित योजना में मजदूरों के स्थान पर मशीनों का उपयोग किया गया। यदि ऐसा हुआ है तो यह योजना की मूल भावना और नियमों का सीधा उल्लंघन है। मौके पर देखने से प्रतीत होता है कि जितनी गहराई तक खुदाई स्वीकृत थी, उतनी नहीं की गई। निर्माण के दौरान आवश्यक “तराई” (क्योरिंग) भी ठीक से नहीं की गई, जिससे गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।


कबीरधाम जिले में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में चेक डैम और स्टॉप डैम बनाए जा रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि 5 प्रतिशत स्थानों पर भी स्थायी जल संग्रह नहीं दिखता। अधिकतर ढांचे बरसात के कुछ समय बाद सूखे ढांचे में बदल जाते हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि जल संरक्षण की जगह बजट खर्च करने की प्रवृत्ति हावी है।


सबसे बड़ा सवाल जिम्मेदार

अधिकारियों की कार्यशैली पर उठता है। क्या निर्माण से पहले स्थल का वैज्ञानिक परीक्षण हुआ। क्या भौतिक सत्यापन किया गया? यदि किया गया तो परिणाम शून्य क्यों है ।


कुल मिलाकर कोयलारी कला का यह चेक डैम निर्माण सरकारी धन के दुरुपयोग और निगरानी तंत्र की विफलता का उदाहरण बनता दिख रहा है। यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो “जल संग्रह” के नाम पर ऐसे ही सूखे ढांचे खड़े होते रहेंगे और जनता को मिलेगा केवल कागज़ी विकास।

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