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पंचवटी से उठा वैराग्य का संदेश : वाल्मीकि रामायण और मुंडकोपनिषद की दृष्टि से सीता हरण प्रसंग - NN81



न्यूज़ नेशन 81 झोतेश्वर नरसिंगपुर

संजय साहू

परमहंसी गंगा आश्रम में चातुर्मास प्रवचन के दौरान द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज ने वाल्मीकि रामायण का महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाते हुए भक्तों को भावविभोर कर दिया।


महाराजश्री ने कहा कि जब राक्षस मारीच ने स्वर्ण मृग का रूप धारण कर सीता जी को मोहित किया, तब श्रीराम ने उसे पकड़ने के लिए धनुष उठाया और एक बाण से उसका वध किया। मृत्यु के समय मारीच ने श्रीराम की वाणी का अनुकरण कर पुकारा– “हा लक्ष्मण, हा सीता!”। यह सुनकर जनकनन्दिनी का हृदय विचलित हो उठा।


सीता जी ने लक्ष्मण जी से आग्रह किया कि वे तुरंत श्रीराम की खोज में जाएँ। किन्तु लक्ष्मण जी ने समझाया कि श्रीराम अजेय हैं और किसी संकट में नहीं हो सकते। परंतु सीता के कठोर वचनों से आहत होकर लक्ष्मण जी ने धनुष बाण भूमि पर रखकर लक्ष्मण रेखा खींची और आदेश दिया कि – “आप इस रेखा के बाहर किसी भी परिस्थिति में मत जाना।”


इसी समय रावण संन्यासी का वेश धरकर वहाँ आया और सीता जी से भिक्षा माँगने लगा। मर्यादा और धर्मपालन हेतु सीता जी ने लक्ष्मण रेखा लाँघी और तभी रावण ने अपने वास्तविक स्वरूप का प्रकट कर सीता का अपहरण कर लिया।


शंकराचार्य जी ने कहा कि रावण का रथ अधर्म, अविवेक और काम-बंधन से जुता हुआ था, जबकि सीता जी धर्म, विवेक और भक्ति की प्रतीक थीं। जैसे ही रावण उन्हें उठा ले गया, माता सीता ने समस्त वृक्षों, पशु-पक्षियों और देवताओं को साक्षी बनाकर कहा –

“हे राम! हे लक्ष्मण! रावण मुझे हर ले गया है, यह समाचार मेरे स्वामी को अवश्य पहुँचा देना।”


महाराजश्री ने समझाया कि यह प्रसंग केवल कथा भर नहीं है बल्कि गहरी जीवन शिक्षा देता है। मारीच स्वर्ण मृग रूप में मोह और माया का प्रतीक है, रावण अहंकार और अधर्म का प्रतीक है, वहीं लक्ष्मण रेखा धर्म की सीमा रेखा है जिसे लाँघते ही संकट सामने आ खड़ा होता है।

इसी प्रसंग को मुंडकोपनिषद् की वाणी से जोड़ते हुए शंकराचार्य जी ने कहा


"परिक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्" 

अर्थात्  जब ज्ञानी यह देख लेता है कि समस्त लौकिक सुख क्षणभंगुर हैं और उनसे आत्मसंतोष नहीं होता, तब वह मोह से विरक्त होकर सत्य के मार्ग की ओर मुड़ता है।

शंकराचार्य जी ने समझाया कि राम धर्म के प्रतीक हैं, लक्ष्मण विवेक के रक्षक हैं और सीता आत्मा की पवित्रता हैं। जब मोह से विवेक पराजित होता है तब आत्मा बंधन में पड़ जाती है। यही बंधन मुक्ति की साधना की प्रेरणा बनता है।


भक्तों की भावनाएँ

प्रवचन सुनकर श्रोताओं की आँखें नम हो गईं। कई भक्तों ने कहा कि उन्होंने पहली बार सीता हरण को इस दृष्टि से समझा।


एक भक्त ने भावुक होकर कहा—पूज्य गुरुदेव की कथा सुनकर “हमें लगा जैसे यह कथा केवल त्रेता युग की नहीं, हमारे अपने जीवन की है। जब-जब हम धर्म की रेखा लांघते हैं, तब-तब रावण जैसे विकार हमें घेर लेते हैं।”


 रत्ना नायक,ने कहा “सीता जी की वेदना सुनकर मन भीतर तक द्रवित हो गया। ऐसा लगा मानो हर बेटी के हृदय की पीड़ा इसमें झलक रही हो। रामकथा ने हमें अपनी मर्यादा की रक्षा करने का संकल्प दिलाया।”


वहीं युवाओं ने कहा कि लक्ष्मण रेखा आज के समय में संयम और अनुशासन की पहचान है। अगर हर कोई अपनी मर्यादा रेखा बनाए तो समाज में अधर्म और अव्यवस्था का प्रवेश ही न है


महाराजश्री ने अंत में कहा

“रामायण केवल कहानी नहीं, यह जीव को जगाने वाला वेदांत है। यदि मनुष्य मोह के पीछे भागना छोड़ दे और आत्मा की रक्षा करे तो जीवन अमृतमय बन सकता है। यही पंचवटी से सीता हरण का संदेश है, यही मुंडकोपनिषद का सत्य है।”

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